गुरुवार, 25 नवंबर 2010

शोर में गुम होते घोटाले,भ्रष्टाचार

भड़काऊ बयान के शोर तले कई घोटाले दब जाते हैं। अधिकांश घोटाले जाँच प्रक्रिया के दायरे में नहीं आ पाते। जाँच होती है तो इतना लंबा समय लगता है कि,अपराधी को बच निकलने का समय मिल जाता है। महाराष्ट्र में आदर्श सोसायटी का मामला उजागर हुआ तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सर-संघ चालक सुदर्शन के बयान पर कांग्रेस ने पूरे देश में हंगामा मचाया, सुदर्शन के पुतले जले और शोर शराबे के बीच मामला ठंडा पड़ गया।
आदर्श सोसायटी में फ्लेट निर्माण कर कारगिल के शहीद परिवारों को बसाना था,जो नहीं हो सका। सारे नियम क़ानून को ठेंगा बताकर ३१ मंजिला इमारत खड़ी कर दी गयी। आदर्श सोसायटी में जन प्रतिनिधि बने नेता, बड़े पदों पर बैठे हमारे नौकरशाह और सेना के वरिष्टतम अधिकारियों ने आदर्श सोसायटी पर फ्लैट ले लिया। मुख्यमंत्री बदल गया पर नए मुख्यमंत्री में इतनी ताकत नहीं है कि राजनीतिक,नौकरशाहों और सेना अधिकारियों से फ्लैट वापस ले लें। कारगिल के शहीद परिवारों का हक़ छीनने पर कांग्रेस ने कोई बवाल नहीं मचाया। उन्हें तो सुदर्शन के बयान पर आन्दोलन करना जरुरी था।
भ्रष्टाचार और घोटाले की राजनीति में आम आदमी पिस रहा है। महंगाई की चक्की में पिसते आम जन को कोई राहत नहीं मिल रही है। राष्ट्र मंडल खेलों में करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ मगर अब तक कोई पकड़ में नहीं आ सका। ऐसा लगता है कि देश की क़ानून व्यवस्था आम आदमी के लिए ही बनी है जिसमें ज़रा सी गलती की और क़ानून के शिकंजे में वह आ गया। हमारी अदालतों में अधिकांश प्रकरण ऐसे ही हैं। बड़े घोटाले, भ्रष्टाचार करने वाले अपने पद, प्रभाव से सब कुछ निपटा लेते हैं। पूर्व पुलिस महानिरीक्षक राठोर पर १८ साल बाद क़ानून का फंदा पडा तो क्या हुआ? देश की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी सी.बी.आई. ने राठोर को क्लीनचिट दे दी। अब सी.बी.आई.के खिलाफ कौन बोलेगा, वह सर्वशक्तिमान जो ठहरी। सी बी आई की कार्यप्रणाली पर जब तब उंगली उठती रही है मगर अब तक उसका रवैया नहीं बदला। २ जी स्पैक्ट्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछताछ की है। केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार चुप्पी साधे बैठी है। घोटाला तो हुआ है पर इसका दोषी कौन है, हर बार की तरह जाँच आयोग बैठा दिया जाएगा और मामला ठंडा पड़ जाएगा।
नक्सलवाद समस्या देश के लिए नासूर बन गयी है। तथाकथित नक्सली अब माफिया गिरोह बन गया है जो भ्रष्टाचारियों से चौथ वसूली कर रहे हैं। नक्सली आम आदमी का जीना हराम कर रहे हैं। यात्री ट्रेनों में विस्फोट,विद्ध्युत आपूर्ती में बाधा और विकास के कार्यों पर रोक लगाना नक्सलियों का मुख्य कार्य बन गया है। मई २०१० में यात्री ट्रेन में विस्फोट के बाद रेलवे सरकार नक्सलियों के आगे नतमस्तक हो गयी है। पश्चिम बंगाल में यात्री ट्रेनें रात में चलना बंद हो गयी हैं। रेलवे का यह निर्णय नक्सलियों के वजूद को और बढ़ाना ही दिख पड़ता है। खैर बंगाल में चुनाव के बाद ही यह तय होगा कि किसमें है दम।
सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दांव पेंच और सत्ता में रह कर भ्रष्टाचार और घोटाले कर धन बटोरना आज मुख्य ध्येय बन गया है। हर जगह लूट का बोलबाला हो गया है। ऐसा कोई कानून नहीं दिख रहा है जो भ्रष्टाचार और घोटालों पर नकेल लगा सके। भड़काऊ बयान के बाद आन्दोलन से सार्वजनिक संपत्ति को जो नुकसान होता है उसकी भरपाई कौन करेगा? इन सबके लिए क़ानून बनाना अब जरूरी हो गया है।
( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २०/११/२०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)

रविवार, 14 नवंबर 2010

मुन्नी नहीं छत्तीसगढ़ बदनाम हुआ

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के मंच से मुन्नी बदनाम हुई। दर्शकों पर पुलिस की लाठी बरसी। सारा नज़ारा कुछ अटपटा सा लगा। ऐसा लगा कि हम बिहार पहुँच गए जहां अक्सर ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है। सारा उत्सव सलमान खान के आने और जाने में ही सिमट गया। सरकारी मंच से आइटम सांग के ठुमके लगे जिसने भीड़ का सैलाब बहा दिया,मगर कुछ अच्छा नहीं लगा। न मालूम सरकार के किस नुमाइंदे का यह किया धरा है कि राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ बदनाम हुआ। सरकार को बदनाम करने की कोई साजिश है इस बात से इन्कार भी नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ निर्माण के दस साल में राज्य ने बेहतर प्रगति की है। रमन सिंह अपनी लोक कल्याणकारी योजनाओं को क्रियान्वित करते हुए देश के मुख्यमंत्रियों को सन्देश भी दे रहे हैं। देश में छत्तीसगढ़ की प्रगति अव्वल नंबर पर पहुंच गयी है। खुशहाल राज्य बनते छत्तीसगढ़ के जन-जन के चेहरे में रौनक झलकने लगी है। छत्तीसगढ़ अपनी उपलब्धियों के लिए एक मिसाल बन गया है। अफसोस है कि राज्योत्सव में एक मिसाल कायम होती जो नहीं हो सकी।
राज्योत्सव की परंपरा में स्थानीय सहित देश के चुनिन्दा व्यक्तित्व की शिरकत होती रही है। हर बार का उत्सव एक सन्देश देता है। छत्तीसगढ़ की लोक कला, परम्परा, उससे जुड़े लोगों को बड़ी आशा होती है कि उन्हें हर कोई देखे। इस बार ऐसा कुछ देखने का उत्साह ही काफूर हो गया क्योंकि उन पर पुलिस का डंडा कहर बरपा गया।
सरकार का मंच किसी कम्पनी के रहमोकरम का मोहताज नहीं है, खासकर छत्तीसगढ़ जैसा समृद्ध राज्य तो हो ही नहीं सकता। सलमान खान और टीवी कंपनी का नाम हर आदमी की जुबान पर चढ़ गया। अफवाहों के पंख पांव पसारते हैं, जहाँ राज्योत्सव का खर्चा टी वी कंपनी अपने जिम्मे ले रही है। ऐसी आम चर्चा का बाजार गर्म है।
छत्तीसगढ़ की जनता में सरकार की छबि और उनकी सोच में एक दुहराव सा आ गया है। राज्योत्सव की शुरुआत ने भीड़ तो बटोर ली पर उनके दिलों पर चोट भी कर दी। सलमान खान और आइटम गर्ल को हर कोई देखना पसंद करता है,पर राज्य के मंच में उनके सम्मान के लिए पलक-पांवड़े बिछा देना,कुछ अच्छा नहीं लगा।
राज्य बनने के एक दशक होने पर कोई यादगार प्रस्तुति होती,सरकार आम आदमी को उत्सव संस्कृति से जोडती, जो नहीं हो सका। फ़िल्मी कलाकार समाज से अलग नहीं हैं पर उन कलाकारों को मंच देना जो फूहड़ अश्लीलता परोसते हैं, उचित नहीं है। सलमान खान जिनके ऊपर कृष्ण मृग को मारने का
आरोप राजस्थान में लगा और दूसरे प्रकरण भी हैं। सामाजिक मर्यादा का पालन नहीं करने वाले कलाकार को छत्तीसगढ़ में अभिनंदित करना गरिमा के अनुकूल नहीं है।
राज्योत्सव में जो हो गया वह नहीं होना था। राज्योत्सव से जो आशा लगी थी वह धूमिल पड़ गयी। राज्य की एक अच्छी सरकार जो अपनी कल्याणकारी योजनाओं को मूर्त रूप दे रही है वह ऐसा कुछ करे कि उसके खिलाफ बोलने के लिए मन मजबूर हो जाये, इसके लिए किसे दोष दिया जाए यह ठीक-ठीक समझ नहीं आता। बहरहाल बदनामी का ठीकरा तो छत्तीसगढ़ में फूट ही गया। राज्योत्सव की नाकामयाबी को ढकने के लिए सरकार को पहल करनी होगी। मुख्यमंत्री रमन सिंह को एक पहल करनी होगी ताकि उनके बढ़ते कदम में वही गति और लय रहे जो अब तक विद्यमान है।
(मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के ५ नवम्बर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

बलि प्रथा के विरोधी कौन ?

चंद्रपुर चंद्रहासिनी देवी के समक्ष बलि दिए जाने का पुरजोर विरोध फिर हुआ। बरसों से चली आ रही बलि प्रथा की खिलाफत कुछ वर्षों से होने लगी है। नवरात्री में देवी के समक्ष पशु बलि धार्मिक परंपरा और आस्था से जुडी है। आधुनिक चश्में से देखने वाले इसे अन्धविश्वास मानें, मगर वे कौन होते हैं किसी धर्म विशेष की परंपरा को ख़त्म करने वाले? बलि प्रथा विरोधी न तो अहिंसक हैं और न ही जीवों पर दया करने वाले लगते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यता,परम्परा और उनकी आस्था पर जब तब प्रहार किया जाता रहा है और यह सिलसिला जारी है। देवी के समक्ष बलि का विधान धार्मिक कर्मकांड से जुड़ा है। मनौती मानने वाले बलि देते हैं जो उनके धार्मिक विश्वास से जुड़ा है। चंद्रपुर में बलि प्रथा विरोधी स्वरों के खिलाफ दिलीप सिंह जूदेव ऐसी ही धार्मिक आस्था के साथ उठ खड़े हुए हैं जो हिन्दुओं की अस्मिता, आस्था की रक्षा है।
बलि प्रथा को अंधविश्वास,कुरीतियों का नाम देने वाले कौन हैं? अगर बलि प्रथा अंध परम्परा है तो बकरीद में कुर्बानी के बारे में ऐसे लोगों की क्या राय है?बलि प्रथा विरोधी जीव प्रेमी हैं तो देश में चल रहे मांसाहार को बंद करवाना चाहिए। हर गाँव-शहरों के कत्लगाह में रोज हजारों जानवर काटे जाते हैं। भारत में कई कत्लगाह हैं जहाँ प्रतिदिन हजारों निरीह पशुओं का वध किया जाता है। मांस, चमड़े का एक बड़ा बाजार कत्लखानों से जुड़ा है। मगर बलि प्रथा की मान्यताएं, विश्वास लोगों की भावनाओं से आबद्ध है। केवल हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ आन्दोलन, विरोधी स्वर गूंजते हैं। क्या यह हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं है?
विश्व की हर धार्मिक परम्पराओं में ऐसे कई कर्मकांड हैं जो 21वीं सदी में ओचित्यहीन लगते हैं। मगर क्या वहाँ इस तरह का पुरजोर विरोध करने का कोई साहस कर सकता है? भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है जहाँ उनकी धार्मिक अस्मिता के खिलाफ जब-तब विरोधी स्वर उठते हैं। ऐसे लोग अपना विरोध जाहिर कर समाज में क्या दिखाना चाहते हैं यह समझ से परे है। मगर एक बात साफ है कि वे अपनी खिलाफत से हिन्दुओं की मान्यताओं, परम्पराओं को खत्म करना चाहते हैं। हिन्दुओं को सनातन धर्मी कहा जाता है क्योंकि वे प्रकृति से जुड़े हैं। अधिसंख्य हिन्दू शाकाहारी हैं। जिनके कुछ पर्वों में बलि प्रथा का विधान सदियों से चला आ रहा है।
बलि प्रथा विरोधियों को अपना दृष्टिकोण समाज के समक्ष रखना चाहिए। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे केवल हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं, आस्था पर प्रहार करना चाहते हैं या फिर जीव प्रेमी हैं जो हर निर्दोष पशु को बचाना चाहते हैं। ऐसे तथाकथित समाज सेवक अपने ही आईने के सामने शर्मसार होंगे। अगर वे शर्मसार नहीं होना चाहते हैं तो बकरीद की कुर्बानी की खिलाफत क्यों नहीं करते ? देश में कत्ल खानों को बंद क्यों नहीं करवाते जहाँ पशु वध रोज होता है। समाज में फ़ैली कुरीतियों, अंधविश्वास को दूर करने वाले खुद ही दागदार हों तो क्या होगा? बलि प्रथा धार्मिक विश्वास से जुडी है, उन आस्थाओं पर प्रहार करना उस धर्म की खिलाफत करना है,उनकी परम्परा, संस्कृति को बिगाड़ना है। जो कतई उचित नहीं है।
(मेरे अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २० अक्टूबर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

जय अग्रोहा-जय अग्रसेन

अग्रोहा गणराज्य के संस्थापक महाराजा अग्रसेन की गौरव गाथा आज भी कही जाती है। पाँच हजार वर्ष पूर्व एक ऐसा राजा हुआ जिसके राज्य में लोकतंत्र था। दुनिया में असंख्य राजा हुए उनमें महाराजा अग्रसेन ने जो मिसाल कायम की जिससे उनकी कीर्ती पताका समूचे विश्व में फहरा रही है। अग्रसेन जी के राज्य में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली थी। अहिंसा,समर्पण,राष्ट्र प्रेम के साथ अग्रोहा में समाजवाद था। जहाँ हर धर्म,जाति का सम्मान था। अमीरी-गरीबी की विषमता जहाँ नहीं दिखती थी वहाँ के नागरिक व्यापार,कृषि,गोपालन के साथ वीर सिपाही भी थे। आपसी भाईचारा, प्रेम, सदभाव के साथ हर नागरिक देशभक्त था। यह केवल इसलिए कि राजा अग्रसेन ने अपने हर नागरिकों के उत्थान के लिए ऐसी व्यवस्था कायम की थी जिसमें वैभवशाली सुख-शांति विराजमान थी।
अग्रोहा में बसने वालों के हर घर से एक ईंट एक रूपया मिलता था। जहाँ एक लाख परिवार रहते थे। घर और काम शुरू करने के लिए धन की व्यवस्था नागरिक करते थे,क्योंकि यह राजा का आदेश था। अग्रोहा की शासन व्यवस्था,खुशहाली को देखकर अनेक लोग यहाँ बसते गए। राज्य के हर नागरिक के लिए एक ही नियम था,जो एक-दूसरे के हित के लिए तत्पर रहते थे।
महाराजा अग्रसेन ने केवल राज्य ही नहीं किया बल्कि सिद्धांतों को प्रतिस्थापित भी किया। अपने गणराज्य के नागरिकों में दान,धर्म और लोकोपकारिता के लिए प्रेरित किया। अपार शक्ति, वैभव को जनहितार्थ के लिए लगाया। जिन्होंने अपना राज्य अट्ठारह गणों में बांटा और अग्रोहा को राजधानी घोषित किया। महाराजा अग्रसेन के अट्ठारह पुत्र हुए। हर पुत्रों को अलग-अलग गुरुओं से शिक्षा दिलाई। उन्हीं गुरुओं के नाम से अट्ठारह गोत्र बने। अग्रवालों में अट्ठारह गोत्र आज भी हैं।
अग्रवाल जो आज भी दान-धर्म समाज सेवा में सबसे आगे हैं। समाज प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन के पद चिन्हों पर चलकर अग्रवालों ने दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। राष्ट्र सेवा के साथ आपसी भाई चारा की भावना,हर धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा जताने वाले अग्रवाल,जहाँ भी हैं वहाँ पथिकों के लिए धर्मशाला जरुर बनी है। अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्द अग्रवाल शिक्षा संस्थान, पेयजल, अस्पतालों, गोशालाओं के साथ नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं को मुहैया करवाने में आज भी आगे हैं।
आश्विन शुक्ल पक्ष की एकम को महाराजा अग्रसेन जन्में थे। हर वर्ष उनकी जयन्ती मनाकर उनके सिद्धांतों आदर्शों को याद किया जाता है। महाराजा अग्रसेन ने अपने नागरिकों को एवं समाज को जो पथ दिखलाया था उसका ही प्रताप आज अग्रवालों के लिए वरदानी सिद्ध हुआ है। भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश में देशभक्ति,समता, परोपकार की बयार चले तथा हम महाराजा अग्रसेन जी के चरित्र को अपने जीवन में आत्मसात करें,ताकि देश और समाज के लिए हम एक मिसाल बन सके। यही आज के लिए बड़ी जरुरत है। महापुरुषों को याद कर अपने जीवन को सफल ऐसे ही बनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन देश,समाज, नागरिकों की समृद्धि, प्रगति के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे। जिनके सिद्धांतों की ज्योति तले सभी का मार्ग आलोकित हो ऐसी कामना है।

(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के 05/10 /10 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

क्या आतंकवाद रंगीन होता है?

वैराग्य,सन्यास,के भगवा रंग को राजनीति के चलते आतंकी करार दे दिया।देश की युवा पीढ़ी "भगवा आतंकवाद" का शिकार हो रही है। गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने देश के पुलिस प्रमुखों की बैठक में आतंकवाद को एक रंग दे दिया। विडम्बना पूर्ण गृहमंत्री का ऐसा बयान भावनाओं को आहत करने वाला है जो भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर भी एक मर्मान्तक प्रहार है।
संतों का भगवा वस्त्र आजादी के दीवानों का पर्याय भी बना।बंकिमचंद्र चटर्जी ने भगवा ध्वज तले वन्दे मातरम काअलख जगा आजादी के दीवानों को एक दिशा प्रदान की थी। जहाँ से राष्ट्र के लिए बलिदान की शुरुआत हुई। भगवा रंग आजादी बलिदानी और शुचिता का प्रतीक है। राष्ट्रीय ध्वज में यही भगवा
रंग केशरिया बाना बना है।
गृहमंत्री भगवा आतंकवाद कहकर क्या रंग दे रहे हैं। गृहमंत्री नासमझी में ऐसे वक्तव्य नहीं दे सकते। आखिर वे कौन से तथ्य हैं जहाँ से भगवा आतंकवाद के रूप में उपजा। गृहमंत्री को स्पष्ट कर देना चाहिए।
आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता उसमें केवल हिंसा का क्रूर, तांडव होता है, जहाँ मानवता कराहती है,इंसानियत मरती है तब जीवन नहीं दरिन्दगी का सैलाब उमड़ पड़ता है। आतंक समूची प्रकृति, समाज, परिवार को खत्म करता है। आतंकी, इंसानी मुखौटा लगाये धरती, अपनी माँ की कोख तक को कलंकित करते हैं। इनका कोई रंग नहीं, धर्म नहीं और इंसानियत से कोई वास्ता नहीं होता।
भगवा वस्त्रों को संतों ने इसलिए धारण किया क्योंकि भगवा शरीर की दूषित भावनाओं को ख़त्म करता है,फिर यह भगवा रंग आतंकवाद का पर्याय कैसे हो सकता है। जीवन से विरक्त होकर सन्यासी बनने वालों ने भगवा बाना को अपनाया। दसवीं सदी में हिन्दुस्थान को एक सूत्र में बांधने वाले शंकराचार्य भगवाधारी थे। जिन्होंने देश की विभिन्न जाति-धर्म की एकता के लिए चार तीर्थों की स्थापना की थी। केदारनाथ,द्वारिका,रामेश्वरम और पुरी में शंकराचार्य की पीठ की महान परंपरा आज भी चल रही है। सिक्खों की बलिदानी परंपरा से हर गुरूद्वारे में भगवा ध्वज आज भी लहराता है।
विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भगवा धारण कर भारतीय संस्कृति को महिमा मंडित किया था। विश्व के महान ओरेटर आचार्य रजनीश ने भगवा धारण कर अमेरिका तक में तहलका मचाया था। हमारे साधू संत भगवा धारण करते हैं जो उन्हें आम आदमी से अलग एक पहचान देता है। भगवाधारी समाज को शुचिता का सन्देश देते हैं और समाज उन्हें आदर सम्मान देता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भगवा ध्वज आन-बान-शान का प्रतीक है। संघ अपने ध्वज तले समाज सेवा का कार्य अहर्निश करता चला आ रहा है। छत्रपति शिवाजी जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी। जिन्होंने अपना पूरा राज- पाट अपने गुरु रामदास जी को सौंप दिया था। रामदास जी ने फिर से शिवाजी को राज्य का अधिकारी बनाया और उन्हें अपना वस्त्र दिया जो शिवाजी के राज्य का भगवा ध्वज बना। शिवाजी की प्रेरणा मानकर डा.हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। संघ का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का रहा है जो आज भी उस पर अडिग है। राजनीतिक तुष्टिकरण से, संतुष्टिकरण से, धार्मिकता ही नहीं मानवता भी कराह उठी है। भगवा से हिन्दू भावनाएं जुड़ी हैं। उनके संत पूज्यनीय हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कह कर उसे रंग देना क्या उचित है। राष्ट्रीय अस्मिता को बरकरार रखने वाले भगवाधारी देश ही नहीं विदेशों में भी मानवता का सन्देश दे रहे हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कहाँ पनप उठा।
भारत की एकता अखण्डता के सूत्र भगवा रंग -वस्त्र में अवगुन्थित राजनीति,सत्ता पर बरक़रार रहने के लिए देश की अस्मिता को ठेस पहुंचाना है, सामाजिकता नहीं है। आमजन की उदार सहिष्णुता कट्टरपंथ के मार्ग पर चल पड़े तो क्या होगा?
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के २०/०९ /१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

शनिवार, 28 अगस्त 2010

कुछ तो शर्म करो...

ब्लागर जगत के मित्रों की शिकायत हो सकती है कि कई दिनों से अपने ब्लॉग में कुछ लिख क्यों नहीं रहा हूँ. कुछ व्यक्तिगत कारणों से व्यस्तता के चलते लिख नहीं पाया इसलिए मेरे बुद्धिजीवी मित्रों का मै क्षमाप्रार्थी हूँ. परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे मन के गुबार मिट गए हैं. इस बीच विश्व के सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश में जो शर्मनाक घटना घटी और उसकी कोई आक्रोशित प्रतिक्रिया भारत की जनता ने प्रगट नहीं की उससे मन व्यथित हो गया और अपनी व्यथा आप लोगों के समक्ष व्यक्त क़र रहा हूँ इस उम्मीद के साथ शायद कोई जयप्रकाश, दीनदयाल,लोहिया के इस देश की चिंता करेगा और सोचेगा अपने स्वार्थ से राष्ट्र हित बड़ा होता है हम मिटते हैं तो राष्ट्र खड़ा होता है:-
देश का अनाज भले ही सड़ जाये मगर उसे गरीब जनता में नहीं बांटा जा सकता. देश की सरकार का यह मानना है. भारत के 30 करोड़ लोग गरीबी,भूख,कुपोषण से बेहाल हैं.इस फटेहाल देश के 787 सांसदों ने अपनी तकदीर खुद लिख ली. सांसदों ने एक झटके में अपना वेतन तीन गुना बढ़ा लिया. यह कोई मजदूर नहीं हैं जिन्हें अपनी मजदूरी बढ़ाने के लिए जुलुस निकालना पड़ता है या कोई आन्दोलन करके लाठी और गोली खाना पड़ता है. ये हमारे देश के चुनिन्दा जन प्रतिनिधि हैं जिन्हें सौ करोड़ से अधिक लोगों ने सरकार बनाने के लिए चुना है.
16 हजार रूपये पाने वाले सांसदों का वेतन 50 हजार रुपया हो गया इस पर हमारे माननीय सांसदों को संतोष नहीं हुआ.संसद भवन में एक नई नौटंकी हुई.संसद को भंग क़र एक नई सरकार बना डाली जिसके संयुक्त प्रधानमंत्री लालूप्रसाद यादव और मुलायमसिंह बने. लोकसभा अध्यक्ष भाजपा के गोपीनाथ मुंडे को बनाया गया. यह नाटक नौटंकी महज इसलिए कि,तिगुनी वेतन वृद्धि भी हमारे सांसदों का पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं है. आखिरकार सांसदों की अनेक सुख सुविधाओं और भत्ते में बढोतरी की गई.
भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी ने सांसदों के ऐसे रवैये पर विरोध जाहिर किया, मगर सांसदों के नक्कार खाने में आडवाणी की तूती फीकी पड़ गयी. हमारे जन प्रतिनिधि ही ऐसे हैं जो अपनी तनख्वाह,भत्ता,सुविधा खुद तय क़र लेते हैं आखिर वे सरकार जो ठहरे. ऐसा करते वे तनिक भी शर्मिंदा नहीं होते बल्कि देश की जनता का सिर शर्म से झुक जाता है जिन्होंने खुद उनको चुन क़र भेजा है.
सांसदों ने जनता के लिए नहीं बल्कि अपनी खिचड़ी खुद पकाई और भरपूर घी भी डाल लिया.50 हजार रुपया महीना वेतन के अलावा सांसद कार्यालय की खर्च सीमा 20 हजार रूपए से दूना क़र 40 हजार हो गयी.निर्वाचन क्षेत्र के भत्ते को 20 हजार से बढाकर 40 हजार रूपये क़र दिया.निजी वाहन खरीदने के लिए 1 लाख रूपये ब्याज मुक्त ऋण बढकर 4 लाख हो गया. सांसदों द्वारा उपयोग में आने वाले वाहनों की रोड माइलेज 13 रूपये से बढकर 16 रूपये प्रति किलोमीटर क़र दी गई. पेंशन लाभ 8 हजार रूपये से बढकर 20 हजार हो गई.साल भर में सांसद को 1 लाख 50 हजार मुफ्त फोन काल की सुविधा के साथ तीन लैंड लाइन और 2 मोबाईल मुफ्त मिलेंगे. मुफ्त आवास की सुविधा के साथ सरकार 60 हजार का फर्नीचर भी देगी. साल भर में 50 हजार यूनिट बिजली भी मुफ्त.
लोकसभा, राज्यसभा के सांसदों के केवल वेतन पर साल भर में 13 करोड़ 76 लाख खर्च होते हैं और अब 62 करोड़ 50 लाख 75 हजार 796 रूपये का भार संसदीय बजट पर पड़ेगा. सचिवों से एक रुपया अधिक वेतन की मांग करने वाले सांसदों को यह गुमान नहीं है कि वे जनता के चुने हुए जन प्रतिनिधि हैं. वेतन भोगी कर्मचारी नहीं. जनता ने उन्हें जन सेवा के लिए भेजा और उन्होंने जन सेवा के नाम पर घर घर जाकर वोट माँगा है.
देश की लोकसभा और राज्यसभा में 787 सांसदों पर 172 करोड़ रुपया का खर्च आता है जहाँ हमारे सांसद उंघते हैं, कोई चिल्लाता है,कोई लड़ता है मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी एक मत नहीं होते. मगर अपने स्वार्थ के लिए सभी एक स्वर में चिल्ला रहे थे और फिर भी संतुष्ट नहीं हुए. ऐसे में भला देश की गरिमा,अस्मिता की बागडोर थामने वाले हमारे सांसद किसका भला करेंगे. ऐसे में कवि धूमिल की पंक्तियाँ याद आती हैं जिन्होंने लिखा है-
एक आदमी रोटी बेलता है
दूसरा आदमी रोटी सेंकता है
तीसरा आदमी रोटी से खेलता है
यह तीसरा आदमी कौन
मेरे देश की संसद मौन

शनिवार, 31 जुलाई 2010

फैसला स्वागत योग्य

छत्तीसगढ़ में बढती औद्योगिकी गतिविधियों से आम जन जीवन त्रस्त हो उठा है। विपुल संसाधन, एवं सस्ते श्रम ने औद्योगिक परिवेश को गति तो दी मगर संस्टेबल डेवलपमेंट (टिकाऊ विकास) की ओर कोई ध्यान नहीं दियागया। रायगढ़ से राजधानी रायपुर सहित बस्तर जैसे सुदूर क्षेत्र में औद्योगिक प्रदूषण की मार से कई समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। रायपुर का नाम देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहर की सूची में आ चुका। बस्तर की डंकनी -शंखनी नदी देश की सबसे अधिक प्रदूषित नदी बन चुकी है। राज्य की सभी नदियों का कमोवेश यही हश्र हो रहा है। ताप आधारित पावर प्लांट की बाढ़ से भले ही उर्जा के मामले में राज्य आत्म निर्भर दिख रहा है मगर फ्लाई एश के सुरक्षित निपटाने के लिए ठोस कदम व्यवहारिक नहीं हो सके हैं। राज्य में उद्योगों के असंतुलित विकास से अनेक बुनियादी सुविधाएँ आम आदमी से छिनती नज़र आ रहीं हैं। जिसमें नदी सहित भू जल स्तर गिरा है तो कहीं वायु प्रदूषण से बीमारियाँ फैलने का खतरा मंडरा रहा है , विषाक्त औद्योगिक जल खुले आम जल श्रोतों में बहाया जा रहा है। राजधानी रायपुर में जब तब बरसती कालिख से जन जीवन व्यथित हो उठा है। औद्योगिक प्रदूषण फैलने वाले उद्योग आखिर क्यों पर्यावरण के खिलाफ काम करने में डरते नहीं हैं। यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।
मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ में अब और उद्योग नहीं लगाये जायेंगे। यह स्वागत योग्य फैसला है।
विधान सभा में स्थानीय शासन ,परिवहन व पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत की पहल पर अशासकीय संकल्प पारित हुआ यह प्रदूषण के खिलाफ अच्छी शुरुवात है। ठोस अपशिष्ट फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ कठोर कदम उठाने के लिए सरकार कृत संकल्प दिख पड़ रही है, वहीँ इससे सम्बन्धित कुटीर उद्योगों को मूर्त रूप देने की कार्ययोजना बेहतर पहल है। औद्योगिक विकास इस गति से न हो कि वह भस्मासुर साबित होने लगे। छत्तीसगढ़ में उद्योगों का समन्वित विकास हो वहीँ लघु व कुटीर उद्योगों को बढावा देकर एक अच्छी शुरुवात हो सकती है।
नारायण भूषणिया

शनिवार, 24 जुलाई 2010

क्या शहीद चंद्रशेखर आज़ाद को हम भुला देंगे ?

शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म २३ जुलाई १९०६ को म.प्र.के झाबुआ जिले के भावरा गाँव में पंडित सीताराम तिवारी के घर हुआ था। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था।
कल २३ जुलाई को मन में यह भाव उठा कि,आज उस महान शहीद की कोई प्रतिमा इस छत्तीसगढ़ की राजधानी में ढूँढें और उस पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाये तथा अपने अखब़ार 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ 'में यह जानकारी छापी जाए । राज़धानी में एक चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड है तथा एक आज़ाद चौक भी है यह हमें मालूम था। मैं 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़' में अपनी सहयोगी अर्चना हुखरे के साथ शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की मूर्ति की तलाश में निकल पड़ा। मठ पुरेना क्षेत्र जो वर्तमान में चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड के नाम से जाना जाता है। स्वाभाविक रूप से वहां शहीद आज़ाद की मूर्ति होगी,यह विचार मन में आया,हम वहां गए और पता भी लगाया पर वहां कोई भी मूर्ति नहीं मिली।
फिर हम आज़ाद चौक गए तो सबसे बड़ा आश्चर्य ये हुआ कि,आज़ाद चौक के नाम से जो चौक है,वहां प्रतिमा गाँधी जी की लगी हुई है। कुछ पुराने जानकारों से एवं अन्य विश्वस्त सूत्रों से जानकारी मिली कि,गाँधी जी की मूर्ति वाले इस चौक का आज़ाद चौक नाम १४ वर्षीय बलीराम आजाद की स्मृति में रखा गया था। बलीराम आजाद ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वानर सेना बनाई थी।बलीराम जी के बारे में और कोई ज्यादा जानकारी तत्क्षण नहीं मिल पाई और यह हमारा कल का विषय भी नहीं था।
आज़ाद चौक पर लगी गाँधी जी की मूर्ति को बनवाने का श्रेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कमलनारायण शर्मा को जाता है। उन दिनों पंडित रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री थे। प्रशासन मुख्यमंत्री शुक्ल से उद्धघाटन कराना चाहता था किन्तु कमलनारायण शर्मा इसके लिए तैयार नहीं हुए।
उन दिनों राष्ट्रपति डा.राजेन्द्रप्रसाद रायपुर आने वाले थे।श्री शर्मा डा.राजेन्द्रप्रसाद के कर कमलों से मूर्ति का उद्धघाटन कराना चाहते थे। मुख्यमंत्री शुक्ल प्रतिमा को देखने आये। सरकार और राष्ट्रपति को खबर दी गई कि,मूर्ति गाँधी जी जैसी नहीं दिखती है। इससे विवाद निर्मित हो गया।
१४ सितम्बर १९५६ को महामहिम राष्ट्रपति जी आने वाले थे,इसके पूर्व १३ सितम्बर की शाम को कमलनारायण शर्मा और रामसहाय तिवारी ने एक हरिजन की बेटी से प्रतिमा का
उद्धघाटन करा दिया। बाद में इस हरिजन बेटी ने महामहिम को माला भी पहनाई थी।
ये तो हुई गाँधी प्रतिमा वाले आज़ाद चौक की कहानी।
हमें बहुत दुःख और गुस्सा भी आया कि,रायपुर में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की एक भी प्रतिमा नहीं लगी है।
हमने चंद्रशेखर आज़ाद के चित्र पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
मेरी उन साथियों से आग्रह है जो ये मानते हैं कि,भारत को आज़ादी दिलाने में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का भी अतुलनीय योगदान है,तो अपने अपने स्तर पर उन्हें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहीद आज़ाद की स्मृति में बनाये गए वार्ड में उनकी भव्य प्रतिमा लगवाकर उनकी आने वाली पुण्य तिथि २७ फ़रवरी को उद्धघाटन करवाने का प्रयास करना चाहिए।
नारायण भूषणिया

सोमवार, 19 जुलाई 2010

जगदीश उपासने को पितृ शोक

रायपुर १९ जुलाई , आज भाई जगदीश उपासने के पिताश्री दत्तात्रय उपासने का ८७ वर्ष कि आयु में निधन हो गया।उपासने परिवार रायपुर का या यूँ कहा जाये सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का एकमात्र ऐसा परिवार है जिसने आपातकाल में सबसे ज्यादा पीड़ा झेली है। बाबूजी एवम आई (श्रीमती रजनी ताई उपासने ) ने वो १९ महीने कैसे घर में काटे होंगे जब उनके तीन-तीन बेटे मीसा के काले कानून में जेल में बंद कर दिए गए थे। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सच्चिदानंद उपासने तो उस समय मात्र १८ वर्ष के ही थे जब उन्होंने १९ माह की जेल काटी।
बाबूजी तो शारीरिक रूप में आपातकाल के दौरान ही कमजोर होने लगे थे पर लोकतंत्र पर हुए प्रहार के विरोध में अपने बेटों के द्वारा किये गए सत्याग्रह से उनका सीना गर्व से फूला रहता था और फिर ममतामयी मां रजनी ताई का भी तो ध्यान रखना था,आखिर उस माँ पर क्या गुजरती होगी जिसके बेटे बिना किसी अपराध के जेल में हो . इस प्रकार की मानसिक पीड़ा को झेलते बाबूजी का स्वास्थ्य कमजोर होता रहा और वे जिन्दगी की हर जंग को लड़ते लड़ते आज मौत से हार गए .
आज शाम ५ बजे रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में उनका नश्वर शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया . उनके अंतिम समय में अस्पताल में मुख्यमंत्री डा.रमनसिंह उपस्थित थे तथा अंतिम संस्कार के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ट शांताराम जी ,दिनकर भाकरे ,मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ,खनिज निगम के अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल,गृह निर्माण मंडल केअध्यक्ष सुभाष राव ,सांसदरमेश बैस,भाजपा,आर .एस .एस.,विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं
सहित शहर के सभी वरिष्ट पत्रकार गणों ने उपस्थित होकर स्वर्गीय दत्तात्रेय उपासने को श्रद्धांजली अर्पित की.
मेरी ईश्वर से यह प्रार्थना है कि,अतिपूज्य ताई तथा सम्पूर्ण उपासने परिवार को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें .ॐ शांतिः शांतिः शांतिः -नारायण भूषणिया

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

क्या ये वही रायपुर है ?

किसी भी काम को करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति का होना जरुरी है और यह कर दिखाया है राजधानी रायपुर के नवनियुक्त पुलिस एस.पी. दीपांशु काबरा ने. रायपुर नगर जब से छत्तीसगढ़ की राजधानी बना तबसे यहाँ आबादी का यातायात पर भारी दबाव पड़ा तथा भयमुक्त वातावरण बनाने के चक्कर में यह नगर उद्दण्ड एवम अनुशासनहीन नागरिकों का नगर बन कर रह गया है.यातायात के नियमों को तोड़ने में नेता,नागरिक,अधिकारी,छात्र,आदि सब में होड़ मच गई तथा सभी नियमों को तोड़ने में ही अपनी शान समझने लगे,ऐसे में वे नागरिक जो अनुशासित जीवन जीने के आदी हैं उन्हें सर्वाधिक परेशान होना पड़ रहा था. ऐसे समय में दीपांशु काबरा ने सफलता अर्जित की. पूरे शहर में यातायात व्यवस्था चुस्त दुरुस्त नजर आने लगी है पर बड़े व्यावसायिक काम्प्लेक्स तथा बाजार वालों ने पार्किंग स्थलों को घेर रखा है उन्हें खाली कराने की और जरुरत है.
शहर की हर व्यस्ततम सड़कों पर चलना आसान हो गया है. बरसों से स्टेशन रोड,मालवीय रोड गोल बाजार,बंजारी रोड,मौदहापारा,सदर बाजार,रामसागरपारा आदि की यातायात व्यवस्था चरमराई हुई थी,इन मार्गों पर पुलिस की पैनी नजर इन दिनों लगी हुई है जो सुखद लग रही है. सडकों पर लगने वाले बाजारों से सड़कें मुक्त हो रही हैं.
यातायात व्यवस्था को बनाने के लिए पुलिस का अभियान सतत बना हुआ है,इस उपलब्धि के लिए राजधानी के दोनों मंत्रीगण बृजमोहन अग्रवाल एवम राजेश मूणत बधाई के पात्र हैं जिन्होंने बिना किसी राजनितिक हस्तक्षेप के एस.पी.को फ्री हैण्ड दिया.
रेलवे स्टेशन की यातायात व्यवस्था भी सुधरती दिख रही है.यात्रियों के लिए प्री पैड ऑटो बूथ जो मरणासन्न हो गया था अब चुस्त दुरुस्त हो गया है.लाउडस्पीकर द्वारा ऑटो वाहनों को निर्देश से पैदल चलने वालों की मुसीबते ख़त्म हो गई हैं.
कुछ सुधार अभी अपेक्षित हैं जिसमें भीड़ भाड़ वाले क्षेत्रों में सड़क के किनारे शराब दुकानों से ट्रैफिक समस्या गंभीर हो रही है,इसके लिए नगरनिगम,आबकारी विभाग सहित पुलिस प्रशासन को विशेष ध्यान देना चाहिए.जहाँ शराब खरीदने और पीने वालों की भीड़ से छुटपुट वारदातें घटती रहती है.इस प्रकार की गंभीर स्थिति रेलवे स्टेशन के सामने,शास्त्री बाजार,पंडरी मेन रोड,खमतराई,भानपूरी आदि स्थानों पर देखी जा सकती है.
बहरहाल रायपुर को एक कुशल अधिकारी की जरुरत थी जिसकी पूर्ति काबरा कर रहे हैं.पुलिस की मुस्तैदी सतत चलती रहेगी तभी यहाँ की व्यवस्था में सुधार आएगा.पैदल चलने वाले राहत महसूस कर रहे हैं फिर भी उन्हें नियमों से बांधना जरुरी है.वहीँ अवैध वसूली का भय अब नहीं रहा यह एक शुभ संकेत है.

सोमवार, 5 जुलाई 2010

ये आखिर क्यों...?

फिर से छत्तीसगढ़ के नारायणपुर से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर भारतमाता के सपूतों को इस देश के ही कपूतों ने मौत की नींद सुला दिया। 27 नौजवान शहीद हो गए और 15 घायल।
क्या हो गया इस देश को? राष्ट्र की सीमाओं पर विदेशियों से अपने देश की रक्षा करते हुए जितने लाल शहीद नहीं हुए होंगे, उससे अधिक अपनी ही धरती पर अपने ही भटके हुए भाइयों के द्वारा मारे गए।
नक्सलवाद के नाम पर चल रहे आतंकवाद को नेस्तनाबूत करने के लिए कब जागेगी केंद्र सरकार?जो सरकार अपने देश के भीतर घुसे देशद्रोहियों को समाप्त करने में असफल हो रही है वो सरकार विदेशियों से कैसे देश की सीमाओं की रक्षा कर सकेगी ?
आखिर केंद्र सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है जो नक्सली हमले से निपटने में नाकाम होने का सारा दोष राज्य सरकारों पर मढ़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है।
आखिर क्यों ? नक्सली आतंकवाद के खिलाफ सेना का इस्तमाल करने के मामले में केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में मतभेद उजागर होते हैं? पशुपति से तिरुपति तक के कारीडोर में सशक्त हुए माओवादियों के पोषक तत्व कहीं केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में तो नहीं बैठे हैं ?
110 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में क्या कोई लोहपुरुष नहीं है जो इस राष्ट्र का नेतृत्व कर इन समस्याओं से देश की जनता को उबारे ?
कुछ लोगों का कहना है कि नक्सलवाद के पीछे चीन का हाथ है। अगर यह सही है तो कभी क्या ऐसा नहीं हो सकता कि,चीन 1962 की तरह हमारी सीमाओं पर आक्रमण करे और सेना देश की रक्षा के लिए उनसे लड़े और उसी समय भारत के 12 राज्यों में फैले माओवादियों बनाम नक्सलवादियों बनाम आतंकवादियों द्वारा कहीं देश के भीतर तथाकथित क्रांति शुरू कर दी गई तब क्या होगा ?
क्या हम उस समय भी सेना का इस्तमाल नहीं करेंगे? क्या नक्सलवादियों की यह लड़ाई किसी युद्ध से कम है ? यदि इसे हम युद्ध की तरह नहीं लेंगे तो ऐसा न हो कि इस धरती से कहीं कोई और देश का उदय हो जाये ?और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का धर्म निभाने वाले मंत्री,नेता तथा मोमबत्ती जलाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करके फोटो छपाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी देखते रह जायेंगे।
देश की 80 प्रतिशत जनता इस लड़ाई के कारण को समझ ही नहीं पा रही है और आये दिन समाचारपत्रों में आई खबरों को पढ़कर आकाश की ओर भगवान को ताकते हुए पूछती है ये आखिर क्यों...?

रविवार, 27 जून 2010

छत्तीसगढ़ याने अमीरगढ़

पिछले कुछ दिनों से छतीसगढ़ अमीरों का गढ़ बन गया है। कभी आयकर विभाग के छापे कभी सी.बी.आई. के। हर छापों में हजारों लाखों की अघोषित आय नहीं करोडो का गोलमाल है। अब इस अमीर धरती ने गरीब नहीं अमीरों को जन्म देना प्रारंभ कर दिया है। भारत के कोने कोने से लोग छत्तीसगढ़ की तरफ भागे चले आ रहे हैं। यहाँ के निवासी भी अपनी जमीनों के मुहं मांगे दाम मिलने से फीलगुड में हैं। सभी वर्त्तमान में जी रहे हैं ,किसी को भविष्य की चिन्ता ही नहीं है।
किसी समय राजनीति सेवा का माध्यम हुवा करती थी , आज इसके मानें बदल गए हैं। सेवा का मूलमंत्र अब मेवा प्राप्ति का एक तंत्र बन गया है। भ्रष्टाचार नस नस में समा गया है ,तथा लोगों में बड़ी बेदर्दी से धन प्राप्त करने की हवस बढ़ी है,यह कहाँ जाकर रुकेगी भगवान जानें। समाज में हो रही किसी गलत हरकत पर आलोचना करने से आलोचक को नकारात्मक सोच वाला करार दिया जाता है। किसी की गलतियों पर परदा डालने वाला या मौन रहने वाला व्यक्ति सकारात्मक सोच वाला "possitive
thinker" कहलाता है।
वर्तमान सामाजिक परिवेश में मुझे तो यही कहना है :-
कल को, जो चला गया याद कर रहा हूँ ,
कल को, जो आने वाला है इंतजार कर रहा हूँ ,
आज जो सन्मुख है भुगत रहा हूँ !
जनता का है वरदान , मेरा भारत महान .......

शुक्रवार, 25 जून 2010

वाह रे बाबूलाल.... तूने कर दिया कमाल....

उड़ीसा के राजा खरियार से पलायन करके आये सामान्य मध्यम परिवार के सदस्य बाबूलाल छत्तीसगढ़ में अपने कार्यकाल में जहाँ भी रहे सुर्ख़ियों में रहे.इनके मातहत अधिकारी,कर्मचारी या पीड़ित व्यापारी वे चाहे राजनांदगाँव,दुर्ग जिले के या अन्य कहीं के हों, जब इनके यहाँ सी.बी.आई. तथा आयकर विभाग के छापे के बाद प्राप्त बेनामी संपत्ति के कारण राज्य सरकार द्वारा इन्हें निलम्बित किया गया तो बहुत से लोगों के मन में यह विचार थे कि, अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे....
पूर्व कृषि सचिव,जब स्वास्थ्य सचिव थे तब उनके द्वारा एक कांग्रेसी नेता के अधिकारी पुत्र के साथ मिलकर किये गए स्वास्थ्य घोटाले की श्याही अभी सूख भी नहीं पाई थी कि ये छापे की कार्यवाही हो गयी बाबूलाल पर .
ईमानदार वह है जिसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिला इस वाक्य को अपने जीवन का उद्देश्य बनाने इस अधिकारी ने इसे जहाँ मौका मिला खूब भ्रष्टाचार किया तथा ईमानदारी के मुहं पर तमाचा मारा .
फिर भी देर आया दुरुस्त आया की तर्ज पर राज्य सरकार ने इस अधिकारी को निलंबित कर दिया .जब इस अधिकारी के यहाँ छापा पड़ा तब पास के गाँव के गरीब २२० कृषको के बैंक खातों की जानकारी सारे देश को मिली थी जिसका संचालन इस अधिकारी के परिवार वाले कर रहे थे. एक पढ़ा लिखा मेधावी युवक अपनी प्रतिभा का उपयोग किस प्रकार गलत दिशा में करता है इसका जीता जागता सबूत है बाबूलाल अग्रवाल .
सैकड़ो करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति रखने वाले इस अधिकारी को विलम्ब से निलम्बित किया गया, इसकी जड़ें इतनी मजबूत हैं इस बात से प्रमाणित होता है कि इसे बहाल करने में सरकार ने कोई देरी नहीं की.
नियमानुसार निलम्बन के ९० दिनों के भीतर राज्य शासन द्वारा इस अधिकारी को आरोप पत्र तथा आरोप विवरण देना था, परन्तु इस भ्रष्ट अधिकारी के पोषक तत्वों ने यह नहीं होने दिया तथा बी.एल.अग्रवाल को बहाल कर राजस्व मंडल बिलासपुर का सदस्य बनाकर अति -महत्वपूर्ण पद पर बैठा दिया. भ्रष्टाचार को बढावा देने वाले इस निर्णय ने राज्य सरकार को भी संदेह के घेरे में ला दिया है और लोग यही गुनगुना रहे हैं... वाह रे बाबूलाल तूने कर दिया कमाल...