गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

कला धन में जनता व सरकार

विदेशों में जमा भारत के काला धन पर प्रधानमंत्री मनमोहन की नकारात्मक टिप्पणी ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जर्मन बैंक में जमा काला धन के खाताधारकों के नाम की सूची सरकार के पास आ चुकी है। जर्मन सरकार ने यह सूची भारत को सौंपी है। विकीलिक्स स्विट्जर लैंड की बैंक में भारतीय खाताधारियों के नाम उजागर करने जा रहा है। ऐसे में क्या गोपनीयता भंग नहीं होगी। गांधी परिवार के खाते स्विस बैंक में होने की पुष्टि हो गई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विदेशों में जमा काला धन खाताधारियों को इसलिए बचाने में लगे हैं कि गांधी परिवार के खाते सार्वजनिक न हों। विदेशों में काला धन जमा करने वाले भ्रष्ट राजनीतिज्ञ हैं तो घोटाले और भ्रटाचार में लिप्त उच्च अधिकारी भी हैं,जिन्होंने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए देश में घोटाले किये और देश की जनता तक पहुँचने वाली विकास, सहयोग की धन राशि पर खुलेआम डाका डाला है। घोटालेबाज राजनीतिज्ञ को भ्रष्ट अधिकारी बचा रहे हैं तो ऐसे अधिकारियों को नेता शह दे रहे हैं। काला धन जमा करने वालों के लिए केंद्र सरकार जिस तरह बचाव की मुद्रा में आगे आई है, उससे सरकार पर आम जनता का विश्वास कम होता नजर आ रहा है। बोफोर्स कांड में दलाली ली गई है जिनके नाम अब जनता के सामने आ चुके हैं। सरकार इस पर क्या कदम उठाने वाली है यह देखना बाकी है। विदेशी बैंकों में जमा काला धन के खाताधारक कौन हैं उनके नाम उजागर नहीं हो सकते तो वह काला धन सरकार भारत वापस लायेगी? यह प्रश्न संदेह के घेरे में है? लोक सभा चुनाव में यह मुद्दा उठा था तब से अब तक ऐसे खाता धारक अपना धन दूसरी जगह ले जा चुके होंगे क्योंकि उन्हें पर्याप्त समय मिल चुका है। ऐसे में क्या भारत सरकार उन सभी खाता धारक की सूची लेगी जिनके बैंक खातों में धन राशि जमा थी। सवाल बहुत हैं और सरकार का बचाव भी भरपूर है। भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, अधिकारियों का काला धन वापस लाना बहुत टेढ़ी खीर है। देश की संसद में ऐसे खाताधारक बैठे हैं। शासन प्रशासन की बागडोर थामे भ्रष्ट अधिकारी भी नहीं चाहते ऐसे में केवल जनता के चाहने, नहीं चाहने से कुछ नहीं हो सकता। खरबों रुपया का काला धन देश की तकदीर बदल सकता है, तो उन राजनीतिज्ञों, अधिकारियों को बेनकाब भी करेगा जिन्होंने देश एवं जनता को धोका दिया है। अगर काला धन जमा करने वालों का नाम उजागर होगा तो सचमुच देश में एक भूचाल उमड़ पडेगा। अगर ऐसे भूचाल के डर से देशद्रोहियों का बचाव सरकार करेगी तो क्या यह न्याय संगत बात होगी? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भारत की तकदीर बदल सकते हैं। जिनकी अब तक की साफ़ सुथरी तस्वीर है। विदेशों में जमा काला धन को लाने की पहल प्रधानमंत्री अगर अभी नहीं करेंगे तो उनकी छवि दागदार हो जायेगी। देश में बढ रही मंहगाई, दिन पर दिन हो रहे घोटाले और पुराने घोटालों के अपराधियों के नाम जिस तरह सामने आ रहे हैं, उन पर केंद्र सरकार की नकारात्मक कार्यवाही से आम-आदमी हतप्रभ है। आखिर प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के सामने क्या मजबूरी है कि वे सत्य को सत्य बोलने में कतरा रहे हैं? बहरहाल देश में जो कुछ चल रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। सत्य का पर्दाफाश देर-सबेर तो होने वाला है। मगर अधिकार संपन्न प्रधानमंत्री मनमोहन की चुप्पी को देश की जनता नहीं भूलेगी। जिनके हाथ में अधिकार है समय उन्हें परखेगा। अपराधी कौन है यह तथ्य जब उजागर होगा तो इतिहास कभी उन्हें माफ़ नहीं करेगा। जो देश की भूखी जनता को निवाला दिला सकता है उसे किसने और क्यों छिना समय ही पूरी दुनिया में सत्य को उजागर करेगा। ( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के 20/01/2011 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

कांग्रेस का जातीय कुचक्र

भारत की राजनीतिक बिसात में धर्म को आतंकवाद से जोड़कर जो खतरनाक खेल खेला जा रहा है वह लोकतंत्र की नींव को खोखला करता नजर आ रहा है। धर्म मानवता की रक्षा के लिए है। सुख समृद्धि की बयार लाता इंसानियत के जज्बे को समाज के सामने रखने वाले धर्म में वह सब कुछ है जो प्रकृति हमें देती है। विडम्बना है कि 125 वर्ष पुरानी कांग्रेस पार्टी अपने वोट बैंक को इसी से जोड़कर तुष्टीकरण की कूटनीति पर चलने को मजबूर होती दिख रही है। महंगाई के भीषण मुद्दे से आम आदमी का ध्यान हटाने का कुचक्र जो आज कांग्रेस रच रही है भविष्य उन्हें शायद माफ़ नहीं करेगा। 2009 के मुंबई कांड के दौरान जो कुछ घटा वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन इस आतंकवादी घटना क्रम को धर्म से जोड़ने का जो षड्यंत्र रचा गया था आज उसी लीक पर कांग्रेस चलती दिख रही है। वीकीलिक्स के साथ भारत में रह रहे अमेरिका के राजदूत ने भी ऐसी आशंका व्यक्त की थी। अमरीकी राजदूत का सन्देश गौर करने लायक है कि कांग्रेस धार्मिक राजनीति की ओर अग्रसर हो सकती है। राजदूत का इस आशय के संकेत को भारत का आम आदमी समझ नहीं सकता। वोट बैंक कहे जाने वाले आम आदमी भी कांग्रेस की इस कूटनीति को शायद कभी नहीं समझ सकेंगे मुंबई कांड के दौरान महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ऐ आर अंतुले ने इसकी पहल की थी तो मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक झूठा शिगूफा छोड़ा था। मुंबई कांड में शहीद करकरे की विधवा ने दिग्विजय सिंह के बयान को झूठा करार दिया है। देश के गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने हिन्दू आतंकवाद कहकर धार्मिक उन्माद को हवा देने की कोशिश की। और अब कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने हिन्दू आतंकवाद कह कर सभी नेताओं के झूठे बयान पर अपनी मुहर लगा दी। राहुल गांधी राजनीति के अनुभवी नहीं हैं पर दिग्गज राजनीतिज्ञ राहुल गांधी को कंधे पर बैठा कर अपनी राजनीति चलाना चाह रहे हैं। हिन्दू आतंकवाद कहना उतना ही गलत है जितना प्रकृति को अपनी मर्यादा छोड़ना। हिन्दू सनातन धर्म है जो प्रकृति के अनुकूल चलता है। दुनिया के किसी धर्म में हिंसा आतंक के लिए कोई जगह नहीं है। किसी भी आतंक, हिंसा को धर्म से जोड़ना सही नहीं है। इस तथ्य को सभी नेता जानते हैं पर आम जनता में धार्मिक उन्माद फैलाकर अपना वोट बैंक बनाने में उन्हें कोई भी मलाल नहीं है। सत्ता के शिखर पर वह जैसे भी आये फिर देश और जनता चाहे जाए भाड़ में। धर्म की आड़ में ना जाने कैसे कैसे खेल खेले जा रहे हैं। दुःख की बात है कि गुलाम भारत में अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए जो कुछ किया आज वही कांग्रेस करने को आमदा हो रही है। इन तमाम नसीहतों को लेकर राजनीति में कोई सुधार आयेगा इसकी कोई सूरत नजर नहीं आती मगर आम जनता को कौन समझाए जो नेताओं के इशारों पर धर्म की राजनीति खेलने के लिए जब तब बेताब होती है, और हर बार ऐसे खेल में आम -आदमी का लहू बहता है लेकिन सत्ता तक तो नेता पहुँच ही जाते हैं। बहरहाल देश में आतंकवाद की आंधी चल रही है। मंहगाई में आम -आदमी पीस रहा है। भ्रष्टाचार में नेता और मालामाल हो रहे हैं। ऐसे में आम आदमी को भटकाने के लिए हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा काफी है। लोग लड़े चाहे मरें राजनीति को मुद्दा चाहिए जिसके दम पर कांग्रेस अपनी सत्ता पर काबिज हो सके। ( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के 05/01/2011 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

बुधवार, 23 मार्च 2011

घोटालों,भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करना होगा

अगर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका नहीं लगाई जाती तो 2 जी स्पेक्ट्रम का घोटाला उजागर नहीं होता। उत्तरप्रदेश में 2001 से गरीबों के अनाज को सत्ता के दलालों, भ्रष्ट अधिकारियों ने विदेशों में बेच दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की वह गौर करने लायक है। यह मामला भी एक जनहित याचिका के कारण सामने आया। ऐसे कई मामले हैं जो प्रजातंत्र को खोखला करते हैं सामने नहीं आ सके तो उस पर जाँच और कार्यवाही होना तो दूर की बात है।
संसद का शीतकालीन अधिवेशन भ्रष्टाचार के खिलाफ जाँच की मांग पर भेंट चढ़ गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चुप्पी ही साध ली। अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो जाँच के लिए सरकार तैयार क्यूँ नहीं होती। दरअसल राजनीति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि उसे सत्य को तनिक भी स्वीकार करने का साहस नहीं है। जहाँ ईमान दम तोड़ चुका है। शर्म हया तक को ताक में रख दिया गया। जहाँ इंसान के नाम पर खून चूसने वाले भयावह चेहरे ही हैं। इनकी असलियत बाहर न आये इसका ही इन्हें भय है। भ्रष्टाचार की दलदल में पनपने वाली राजनीति के कद्दावर चेहरे मानवता के प्रबल शत्रु बन चुके हैं। प्रजातांत्रिक देश के लिए इससे ज्यादा शर्मसार बात क्या होगी? जिन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना वे ही जनता के खून पसीने की कमाई से अपने एशो आराम के साधन जुटा रहे हैं। सार्वजनिक तौर पर अपने आप को हरिश्चन्द्र की प्रतिमूर्ति बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहें हैं।
आम जनता महंगाई के बोझ तले नारकीय जीवन जी रही है। भ्रष्टाचार के दलालों के कारण अपनी इज्जत भी खो रही है, जिसका सब कुछ छिना जा रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आम आदमी का हौसला बढ़ाया है वह काबिले तारीफ है। अगर अब भी जनता नहीं जागी तो उसके साथ और अधिक बुरा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने जिस गंभीरता के साथ 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में सरकार को आड़े हाथ लिया और जाँच के लिए मजबूर भी कर दिया। संचार मंत्री ए. राजा का मंत्री पद छिन गया। मगर राष्ट्र मंडल खेलों में भ्रष्टाचार का खिलाड़ी कलमाडी की चमड़ी क्यों बचाई जा रही है आखिर उसके खैरख्वाह कौन हैं , इसके लिए आम जनता को मांग करनी चाहिए।

चूहे चाहते हैं कि बिल्ली उन्हें पकड़ नहीं सके। मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे यह प्रश्न चूहों के लिए भले आज भी अनुत्तरित होगा पर भारत की आम जनता के हाथों में कई अधिकार हैं। सूचना का अधिकार और जनहित याचिकाओं के माध्यम से कोई भी आम आदमी देश के गद्दारों को बेनकाब कर सकता है। भारत की सारी जनता चूहा नहीं है मगर अधिकांश की सोच के कारण ही देश में भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और अधिकारियों का बोलबाला बढ़ रहा है। जनता केवल जनप्रतिनिधियों को चुन कर अपने भाग्य का फैसला करने वाली चाबी को उन्हें सौंप देना काफी नहीं है। आदमी को अपने दायरे में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ डट कर मुकाबला करना चाहिए। जो ऐसा करते हैं उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। नहीं तो आने वाले दिनों में भ्रष्ट परजीवी इतने विशाल हो जायेंगे कि उनके खिलाफ कोई हथियार कारगर नहीं हो सकेगा।

भ्रष्टाचार और घोटालों को दबाने के लिए कई राजनितिक चालें चली जाती हैं। अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है। आतंकवादी वारदातें बढ जाती हैं। जनता का ध्यान भटक जाये और मुद्दे की बात से वह भटक जाये ऐसा ही होता रहा है। अगर जनता ऐसी भ्रष्ट राजनीति कुचक्र को समझ ले तो बेहतर होगा। उसे भ्रष्टाचार घोटालों के खिलाफ कमर कसना होगा। घूस जो अब दस्तूर बन रही है वह हमारी अपनी कमजोरी है उसे दूर करने के लिए सभी को एक जुट होना होगा तभी उज्जवल भारत की वह तस्वीर उभरेगी जिसका सपना देश के शहीदों ने देखा था। आस्तीनों में पल रहे सापों को मारने के लिए खुद को पहल करनी होगी। ऐसा संकल्प देश के हर गाँव-कस्बों में थोड़े ही लोग लेलें तो देश की संसद का यह हश्र देखने को नहीं मिलेगा जो संसद के शीतकालीन सत्र में देखने को मिला। ( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के 20/12/2010 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

शोर में गुम होते घोटाले,भ्रष्टाचार

भड़काऊ बयान के शोर तले कई घोटाले दब जाते हैं। अधिकांश घोटाले जाँच प्रक्रिया के दायरे में नहीं आ पाते। जाँच होती है तो इतना लंबा समय लगता है कि,अपराधी को बच निकलने का समय मिल जाता है। महाराष्ट्र में आदर्श सोसायटी का मामला उजागर हुआ तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सर-संघ चालक सुदर्शन के बयान पर कांग्रेस ने पूरे देश में हंगामा मचाया, सुदर्शन के पुतले जले और शोर शराबे के बीच मामला ठंडा पड़ गया।
आदर्श सोसायटी में फ्लेट निर्माण कर कारगिल के शहीद परिवारों को बसाना था,जो नहीं हो सका। सारे नियम क़ानून को ठेंगा बताकर ३१ मंजिला इमारत खड़ी कर दी गयी। आदर्श सोसायटी में जन प्रतिनिधि बने नेता, बड़े पदों पर बैठे हमारे नौकरशाह और सेना के वरिष्टतम अधिकारियों ने आदर्श सोसायटी पर फ्लैट ले लिया। मुख्यमंत्री बदल गया पर नए मुख्यमंत्री में इतनी ताकत नहीं है कि राजनीतिक,नौकरशाहों और सेना अधिकारियों से फ्लैट वापस ले लें। कारगिल के शहीद परिवारों का हक़ छीनने पर कांग्रेस ने कोई बवाल नहीं मचाया। उन्हें तो सुदर्शन के बयान पर आन्दोलन करना जरुरी था।
भ्रष्टाचार और घोटाले की राजनीति में आम आदमी पिस रहा है। महंगाई की चक्की में पिसते आम जन को कोई राहत नहीं मिल रही है। राष्ट्र मंडल खेलों में करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ मगर अब तक कोई पकड़ में नहीं आ सका। ऐसा लगता है कि देश की क़ानून व्यवस्था आम आदमी के लिए ही बनी है जिसमें ज़रा सी गलती की और क़ानून के शिकंजे में वह आ गया। हमारी अदालतों में अधिकांश प्रकरण ऐसे ही हैं। बड़े घोटाले, भ्रष्टाचार करने वाले अपने पद, प्रभाव से सब कुछ निपटा लेते हैं। पूर्व पुलिस महानिरीक्षक राठोर पर १८ साल बाद क़ानून का फंदा पडा तो क्या हुआ? देश की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी सी.बी.आई. ने राठोर को क्लीनचिट दे दी। अब सी.बी.आई.के खिलाफ कौन बोलेगा, वह सर्वशक्तिमान जो ठहरी। सी बी आई की कार्यप्रणाली पर जब तब उंगली उठती रही है मगर अब तक उसका रवैया नहीं बदला। २ जी स्पैक्ट्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछताछ की है। केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार चुप्पी साधे बैठी है। घोटाला तो हुआ है पर इसका दोषी कौन है, हर बार की तरह जाँच आयोग बैठा दिया जाएगा और मामला ठंडा पड़ जाएगा।
नक्सलवाद समस्या देश के लिए नासूर बन गयी है। तथाकथित नक्सली अब माफिया गिरोह बन गया है जो भ्रष्टाचारियों से चौथ वसूली कर रहे हैं। नक्सली आम आदमी का जीना हराम कर रहे हैं। यात्री ट्रेनों में विस्फोट,विद्ध्युत आपूर्ती में बाधा और विकास के कार्यों पर रोक लगाना नक्सलियों का मुख्य कार्य बन गया है। मई २०१० में यात्री ट्रेन में विस्फोट के बाद रेलवे सरकार नक्सलियों के आगे नतमस्तक हो गयी है। पश्चिम बंगाल में यात्री ट्रेनें रात में चलना बंद हो गयी हैं। रेलवे का यह निर्णय नक्सलियों के वजूद को और बढ़ाना ही दिख पड़ता है। खैर बंगाल में चुनाव के बाद ही यह तय होगा कि किसमें है दम।
सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दांव पेंच और सत्ता में रह कर भ्रष्टाचार और घोटाले कर धन बटोरना आज मुख्य ध्येय बन गया है। हर जगह लूट का बोलबाला हो गया है। ऐसा कोई कानून नहीं दिख रहा है जो भ्रष्टाचार और घोटालों पर नकेल लगा सके। भड़काऊ बयान के बाद आन्दोलन से सार्वजनिक संपत्ति को जो नुकसान होता है उसकी भरपाई कौन करेगा? इन सबके लिए क़ानून बनाना अब जरूरी हो गया है।
( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २०/११/२०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)

रविवार, 14 नवंबर 2010

मुन्नी नहीं छत्तीसगढ़ बदनाम हुआ

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के मंच से मुन्नी बदनाम हुई। दर्शकों पर पुलिस की लाठी बरसी। सारा नज़ारा कुछ अटपटा सा लगा। ऐसा लगा कि हम बिहार पहुँच गए जहां अक्सर ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है। सारा उत्सव सलमान खान के आने और जाने में ही सिमट गया। सरकारी मंच से आइटम सांग के ठुमके लगे जिसने भीड़ का सैलाब बहा दिया,मगर कुछ अच्छा नहीं लगा। न मालूम सरकार के किस नुमाइंदे का यह किया धरा है कि राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ बदनाम हुआ। सरकार को बदनाम करने की कोई साजिश है इस बात से इन्कार भी नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ निर्माण के दस साल में राज्य ने बेहतर प्रगति की है। रमन सिंह अपनी लोक कल्याणकारी योजनाओं को क्रियान्वित करते हुए देश के मुख्यमंत्रियों को सन्देश भी दे रहे हैं। देश में छत्तीसगढ़ की प्रगति अव्वल नंबर पर पहुंच गयी है। खुशहाल राज्य बनते छत्तीसगढ़ के जन-जन के चेहरे में रौनक झलकने लगी है। छत्तीसगढ़ अपनी उपलब्धियों के लिए एक मिसाल बन गया है। अफसोस है कि राज्योत्सव में एक मिसाल कायम होती जो नहीं हो सकी।
राज्योत्सव की परंपरा में स्थानीय सहित देश के चुनिन्दा व्यक्तित्व की शिरकत होती रही है। हर बार का उत्सव एक सन्देश देता है। छत्तीसगढ़ की लोक कला, परम्परा, उससे जुड़े लोगों को बड़ी आशा होती है कि उन्हें हर कोई देखे। इस बार ऐसा कुछ देखने का उत्साह ही काफूर हो गया क्योंकि उन पर पुलिस का डंडा कहर बरपा गया।
सरकार का मंच किसी कम्पनी के रहमोकरम का मोहताज नहीं है, खासकर छत्तीसगढ़ जैसा समृद्ध राज्य तो हो ही नहीं सकता। सलमान खान और टीवी कंपनी का नाम हर आदमी की जुबान पर चढ़ गया। अफवाहों के पंख पांव पसारते हैं, जहाँ राज्योत्सव का खर्चा टी वी कंपनी अपने जिम्मे ले रही है। ऐसी आम चर्चा का बाजार गर्म है।
छत्तीसगढ़ की जनता में सरकार की छबि और उनकी सोच में एक दुहराव सा आ गया है। राज्योत्सव की शुरुआत ने भीड़ तो बटोर ली पर उनके दिलों पर चोट भी कर दी। सलमान खान और आइटम गर्ल को हर कोई देखना पसंद करता है,पर राज्य के मंच में उनके सम्मान के लिए पलक-पांवड़े बिछा देना,कुछ अच्छा नहीं लगा।
राज्य बनने के एक दशक होने पर कोई यादगार प्रस्तुति होती,सरकार आम आदमी को उत्सव संस्कृति से जोडती, जो नहीं हो सका। फ़िल्मी कलाकार समाज से अलग नहीं हैं पर उन कलाकारों को मंच देना जो फूहड़ अश्लीलता परोसते हैं, उचित नहीं है। सलमान खान जिनके ऊपर कृष्ण मृग को मारने का
आरोप राजस्थान में लगा और दूसरे प्रकरण भी हैं। सामाजिक मर्यादा का पालन नहीं करने वाले कलाकार को छत्तीसगढ़ में अभिनंदित करना गरिमा के अनुकूल नहीं है।
राज्योत्सव में जो हो गया वह नहीं होना था। राज्योत्सव से जो आशा लगी थी वह धूमिल पड़ गयी। राज्य की एक अच्छी सरकार जो अपनी कल्याणकारी योजनाओं को मूर्त रूप दे रही है वह ऐसा कुछ करे कि उसके खिलाफ बोलने के लिए मन मजबूर हो जाये, इसके लिए किसे दोष दिया जाए यह ठीक-ठीक समझ नहीं आता। बहरहाल बदनामी का ठीकरा तो छत्तीसगढ़ में फूट ही गया। राज्योत्सव की नाकामयाबी को ढकने के लिए सरकार को पहल करनी होगी। मुख्यमंत्री रमन सिंह को एक पहल करनी होगी ताकि उनके बढ़ते कदम में वही गति और लय रहे जो अब तक विद्यमान है।
(मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के ५ नवम्बर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

बलि प्रथा के विरोधी कौन ?

चंद्रपुर चंद्रहासिनी देवी के समक्ष बलि दिए जाने का पुरजोर विरोध फिर हुआ। बरसों से चली आ रही बलि प्रथा की खिलाफत कुछ वर्षों से होने लगी है। नवरात्री में देवी के समक्ष पशु बलि धार्मिक परंपरा और आस्था से जुडी है। आधुनिक चश्में से देखने वाले इसे अन्धविश्वास मानें, मगर वे कौन होते हैं किसी धर्म विशेष की परंपरा को ख़त्म करने वाले? बलि प्रथा विरोधी न तो अहिंसक हैं और न ही जीवों पर दया करने वाले लगते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यता,परम्परा और उनकी आस्था पर जब तब प्रहार किया जाता रहा है और यह सिलसिला जारी है। देवी के समक्ष बलि का विधान धार्मिक कर्मकांड से जुड़ा है। मनौती मानने वाले बलि देते हैं जो उनके धार्मिक विश्वास से जुड़ा है। चंद्रपुर में बलि प्रथा विरोधी स्वरों के खिलाफ दिलीप सिंह जूदेव ऐसी ही धार्मिक आस्था के साथ उठ खड़े हुए हैं जो हिन्दुओं की अस्मिता, आस्था की रक्षा है।
बलि प्रथा को अंधविश्वास,कुरीतियों का नाम देने वाले कौन हैं? अगर बलि प्रथा अंध परम्परा है तो बकरीद में कुर्बानी के बारे में ऐसे लोगों की क्या राय है?बलि प्रथा विरोधी जीव प्रेमी हैं तो देश में चल रहे मांसाहार को बंद करवाना चाहिए। हर गाँव-शहरों के कत्लगाह में रोज हजारों जानवर काटे जाते हैं। भारत में कई कत्लगाह हैं जहाँ प्रतिदिन हजारों निरीह पशुओं का वध किया जाता है। मांस, चमड़े का एक बड़ा बाजार कत्लखानों से जुड़ा है। मगर बलि प्रथा की मान्यताएं, विश्वास लोगों की भावनाओं से आबद्ध है। केवल हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ आन्दोलन, विरोधी स्वर गूंजते हैं। क्या यह हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं है?
विश्व की हर धार्मिक परम्पराओं में ऐसे कई कर्मकांड हैं जो 21वीं सदी में ओचित्यहीन लगते हैं। मगर क्या वहाँ इस तरह का पुरजोर विरोध करने का कोई साहस कर सकता है? भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है जहाँ उनकी धार्मिक अस्मिता के खिलाफ जब-तब विरोधी स्वर उठते हैं। ऐसे लोग अपना विरोध जाहिर कर समाज में क्या दिखाना चाहते हैं यह समझ से परे है। मगर एक बात साफ है कि वे अपनी खिलाफत से हिन्दुओं की मान्यताओं, परम्पराओं को खत्म करना चाहते हैं। हिन्दुओं को सनातन धर्मी कहा जाता है क्योंकि वे प्रकृति से जुड़े हैं। अधिसंख्य हिन्दू शाकाहारी हैं। जिनके कुछ पर्वों में बलि प्रथा का विधान सदियों से चला आ रहा है।
बलि प्रथा विरोधियों को अपना दृष्टिकोण समाज के समक्ष रखना चाहिए। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे केवल हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं, आस्था पर प्रहार करना चाहते हैं या फिर जीव प्रेमी हैं जो हर निर्दोष पशु को बचाना चाहते हैं। ऐसे तथाकथित समाज सेवक अपने ही आईने के सामने शर्मसार होंगे। अगर वे शर्मसार नहीं होना चाहते हैं तो बकरीद की कुर्बानी की खिलाफत क्यों नहीं करते ? देश में कत्ल खानों को बंद क्यों नहीं करवाते जहाँ पशु वध रोज होता है। समाज में फ़ैली कुरीतियों, अंधविश्वास को दूर करने वाले खुद ही दागदार हों तो क्या होगा? बलि प्रथा धार्मिक विश्वास से जुडी है, उन आस्थाओं पर प्रहार करना उस धर्म की खिलाफत करना है,उनकी परम्परा, संस्कृति को बिगाड़ना है। जो कतई उचित नहीं है।
(मेरे अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २० अक्टूबर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)