चंद्रपुर चंद्रहासिनी देवी के समक्ष बलि दिए जाने का पुरजोर विरोध फिर हुआ। बरसों से चली आ रही बलि प्रथा की खिलाफत कुछ वर्षों से होने लगी है। नवरात्री में देवी के समक्ष पशु बलि धार्मिक परंपरा और आस्था से जुडी है। आधुनिक चश्में से देखने वाले इसे अन्धविश्वास मानें, मगर वे कौन होते हैं किसी धर्म विशेष की परंपरा को ख़त्म करने वाले? बलि प्रथा विरोधी न तो अहिंसक हैं और न ही जीवों पर दया करने वाले लगते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यता,परम्परा और उनकी आस्था पर जब तब प्रहार किया जाता रहा है और यह सिलसिला जारी है। देवी के समक्ष बलि का विधान धार्मिक कर्मकांड से जुड़ा है। मनौती मानने वाले बलि देते हैं जो उनके धार्मिक विश्वास से जुड़ा है। चंद्रपुर में बलि प्रथा विरोधी स्वरों के खिलाफ दिलीप सिंह जूदेव ऐसी ही धार्मिक आस्था के साथ उठ खड़े हुए हैं जो हिन्दुओं की अस्मिता, आस्था की रक्षा है।
बलि प्रथा को अंधविश्वास,कुरीतियों का नाम देने वाले कौन हैं? अगर बलि प्रथा अंध परम्परा है तो बकरीद में कुर्बानी के बारे में ऐसे लोगों की क्या राय है?बलि प्रथा विरोधी जीव प्रेमी हैं तो देश में चल रहे मांसाहार को बंद करवाना चाहिए। हर गाँव-शहरों के कत्लगाह में रोज हजारों जानवर काटे जाते हैं। भारत में कई कत्लगाह हैं जहाँ प्रतिदिन हजारों निरीह पशुओं का वध किया जाता है। मांस, चमड़े का एक बड़ा बाजार कत्लखानों से जुड़ा है। मगर बलि प्रथा की मान्यताएं, विश्वास लोगों की भावनाओं से आबद्ध है। केवल हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ आन्दोलन, विरोधी स्वर गूंजते हैं। क्या यह हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं है?
विश्व की हर धार्मिक परम्पराओं में ऐसे कई कर्मकांड हैं जो 21वीं सदी में ओचित्यहीन लगते हैं। मगर क्या वहाँ इस तरह का पुरजोर विरोध करने का कोई साहस कर सकता है? भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है जहाँ उनकी धार्मिक अस्मिता के खिलाफ जब-तब विरोधी स्वर उठते हैं। ऐसे लोग अपना विरोध जाहिर कर समाज में क्या दिखाना चाहते हैं यह समझ से परे है। मगर एक बात साफ है कि वे अपनी खिलाफत से हिन्दुओं की मान्यताओं, परम्पराओं को खत्म करना चाहते हैं। हिन्दुओं को सनातन धर्मी कहा जाता है क्योंकि वे प्रकृति से जुड़े हैं। अधिसंख्य हिन्दू शाकाहारी हैं। जिनके कुछ पर्वों में बलि प्रथा का विधान सदियों से चला आ रहा है।
बलि प्रथा विरोधियों को अपना दृष्टिकोण समाज के समक्ष रखना चाहिए। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे केवल हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं, आस्था पर प्रहार करना चाहते हैं या फिर जीव प्रेमी हैं जो हर निर्दोष पशु को बचाना चाहते हैं। ऐसे तथाकथित समाज सेवक अपने ही आईने के सामने शर्मसार होंगे। अगर वे शर्मसार नहीं होना चाहते हैं तो बकरीद की कुर्बानी की खिलाफत क्यों नहीं करते ? देश में कत्ल खानों को बंद क्यों नहीं करवाते जहाँ पशु वध रोज होता है। समाज में फ़ैली कुरीतियों, अंधविश्वास को दूर करने वाले खुद ही दागदार हों तो क्या होगा? बलि प्रथा धार्मिक विश्वास से जुडी है, उन आस्थाओं पर प्रहार करना उस धर्म की खिलाफत करना है,उनकी परम्परा, संस्कृति को बिगाड़ना है। जो कतई उचित नहीं है।
(मेरे अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २० अक्टूबर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
जय अग्रोहा-जय अग्रसेन
अग्रोहा गणराज्य के संस्थापक महाराजा अग्रसेन की गौरव गाथा आज भी कही जाती है। पाँच हजार वर्ष पूर्व एक ऐसा राजा हुआ जिसके राज्य में लोकतंत्र था। दुनिया में असंख्य राजा हुए उनमें महाराजा अग्रसेन ने जो मिसाल कायम की जिससे उनकी कीर्ती पताका समूचे विश्व में फहरा रही है। अग्रसेन जी के राज्य में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली थी। अहिंसा,समर्पण,राष्ट्र प्रेम के साथ अग्रोहा में समाजवाद था। जहाँ हर धर्म,जाति का सम्मान था। अमीरी-गरीबी की विषमता जहाँ नहीं दिखती थी वहाँ के नागरिक व्यापार,कृषि,गोपालन के साथ वीर सिपाही भी थे। आपसी भाईचारा, प्रेम, सदभाव के साथ हर नागरिक देशभक्त था। यह केवल इसलिए कि राजा अग्रसेन ने अपने हर नागरिकों के उत्थान के लिए ऐसी व्यवस्था कायम की थी जिसमें वैभवशाली सुख-शांति विराजमान थी।
अग्रोहा में बसने वालों के हर घर से एक ईंट एक रूपया मिलता था। जहाँ एक लाख परिवार रहते थे। घर और काम शुरू करने के लिए धन की व्यवस्था नागरिक करते थे,क्योंकि यह राजा का आदेश था। अग्रोहा की शासन व्यवस्था,खुशहाली को देखकर अनेक लोग यहाँ बसते गए। राज्य के हर नागरिक के लिए एक ही नियम था,जो एक-दूसरे के हित के लिए तत्पर रहते थे।
महाराजा अग्रसेन ने केवल राज्य ही नहीं किया बल्कि सिद्धांतों को प्रतिस्थापित भी किया। अपने गणराज्य के नागरिकों में दान,धर्म और लोकोपकारिता के लिए प्रेरित किया। अपार शक्ति, वैभव को जनहितार्थ के लिए लगाया। जिन्होंने अपना राज्य अट्ठारह गणों में बांटा और अग्रोहा को राजधानी घोषित किया। महाराजा अग्रसेन के अट्ठारह पुत्र हुए। हर पुत्रों को अलग-अलग गुरुओं से शिक्षा दिलाई। उन्हीं गुरुओं के नाम से अट्ठारह गोत्र बने। अग्रवालों में अट्ठारह गोत्र आज भी हैं।
अग्रवाल जो आज भी दान-धर्म समाज सेवा में सबसे आगे हैं। समाज प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन के पद चिन्हों पर चलकर अग्रवालों ने दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। राष्ट्र सेवा के साथ आपसी भाई चारा की भावना,हर धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा जताने वाले अग्रवाल,जहाँ भी हैं वहाँ पथिकों के लिए धर्मशाला जरुर बनी है। अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्द अग्रवाल शिक्षा संस्थान, पेयजल, अस्पतालों, गोशालाओं के साथ नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं को मुहैया करवाने में आज भी आगे हैं।
आश्विन शुक्ल पक्ष की एकम को महाराजा अग्रसेन जन्में थे। हर वर्ष उनकी जयन्ती मनाकर उनके सिद्धांतों आदर्शों को याद किया जाता है। महाराजा अग्रसेन ने अपने नागरिकों को एवं समाज को जो पथ दिखलाया था उसका ही प्रताप आज अग्रवालों के लिए वरदानी सिद्ध हुआ है। भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश में देशभक्ति,समता, परोपकार की बयार चले तथा हम महाराजा अग्रसेन जी के चरित्र को अपने जीवन में आत्मसात करें,ताकि देश और समाज के लिए हम एक मिसाल बन सके। यही आज के लिए बड़ी जरुरत है। महापुरुषों को याद कर अपने जीवन को सफल ऐसे ही बनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन देश,समाज, नागरिकों की समृद्धि, प्रगति के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे। जिनके सिद्धांतों की ज्योति तले सभी का मार्ग आलोकित हो ऐसी कामना है।
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के 05/10 /10 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )
अग्रोहा में बसने वालों के हर घर से एक ईंट एक रूपया मिलता था। जहाँ एक लाख परिवार रहते थे। घर और काम शुरू करने के लिए धन की व्यवस्था नागरिक करते थे,क्योंकि यह राजा का आदेश था। अग्रोहा की शासन व्यवस्था,खुशहाली को देखकर अनेक लोग यहाँ बसते गए। राज्य के हर नागरिक के लिए एक ही नियम था,जो एक-दूसरे के हित के लिए तत्पर रहते थे।
महाराजा अग्रसेन ने केवल राज्य ही नहीं किया बल्कि सिद्धांतों को प्रतिस्थापित भी किया। अपने गणराज्य के नागरिकों में दान,धर्म और लोकोपकारिता के लिए प्रेरित किया। अपार शक्ति, वैभव को जनहितार्थ के लिए लगाया। जिन्होंने अपना राज्य अट्ठारह गणों में बांटा और अग्रोहा को राजधानी घोषित किया। महाराजा अग्रसेन के अट्ठारह पुत्र हुए। हर पुत्रों को अलग-अलग गुरुओं से शिक्षा दिलाई। उन्हीं गुरुओं के नाम से अट्ठारह गोत्र बने। अग्रवालों में अट्ठारह गोत्र आज भी हैं।
अग्रवाल जो आज भी दान-धर्म समाज सेवा में सबसे आगे हैं। समाज प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन के पद चिन्हों पर चलकर अग्रवालों ने दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। राष्ट्र सेवा के साथ आपसी भाई चारा की भावना,हर धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा जताने वाले अग्रवाल,जहाँ भी हैं वहाँ पथिकों के लिए धर्मशाला जरुर बनी है। अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्द अग्रवाल शिक्षा संस्थान, पेयजल, अस्पतालों, गोशालाओं के साथ नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं को मुहैया करवाने में आज भी आगे हैं।
आश्विन शुक्ल पक्ष की एकम को महाराजा अग्रसेन जन्में थे। हर वर्ष उनकी जयन्ती मनाकर उनके सिद्धांतों आदर्शों को याद किया जाता है। महाराजा अग्रसेन ने अपने नागरिकों को एवं समाज को जो पथ दिखलाया था उसका ही प्रताप आज अग्रवालों के लिए वरदानी सिद्ध हुआ है। भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश में देशभक्ति,समता, परोपकार की बयार चले तथा हम महाराजा अग्रसेन जी के चरित्र को अपने जीवन में आत्मसात करें,ताकि देश और समाज के लिए हम एक मिसाल बन सके। यही आज के लिए बड़ी जरुरत है। महापुरुषों को याद कर अपने जीवन को सफल ऐसे ही बनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन देश,समाज, नागरिकों की समृद्धि, प्रगति के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे। जिनके सिद्धांतों की ज्योति तले सभी का मार्ग आलोकित हो ऐसी कामना है।
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के 05/10 /10 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
क्या आतंकवाद रंगीन होता है?
वैराग्य,सन्यास,के भगवा रंग को राजनीति के चलते आतंकी करार दे दिया।देश की युवा पीढ़ी "भगवा आतंकवाद" का शिकार हो रही है। गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने देश के पुलिस प्रमुखों की बैठक में आतंकवाद को एक रंग दे दिया। विडम्बना पूर्ण गृहमंत्री का ऐसा बयान भावनाओं को आहत करने वाला है जो भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर भी एक मर्मान्तक प्रहार है।
संतों का भगवा वस्त्र आजादी के दीवानों का पर्याय भी बना।बंकिमचंद्र चटर्जी ने भगवा ध्वज तले वन्दे मातरम काअलख जगा आजादी के दीवानों को एक दिशा प्रदान की थी। जहाँ से राष्ट्र के लिए बलिदान की शुरुआत हुई। भगवा रंग आजादी बलिदानी और शुचिता का प्रतीक है। राष्ट्रीय ध्वज में यही भगवा
रंग केशरिया बाना बना है।
गृहमंत्री भगवा आतंकवाद कहकर क्या रंग दे रहे हैं। गृहमंत्री नासमझी में ऐसे वक्तव्य नहीं दे सकते। आखिर वे कौन से तथ्य हैं जहाँ से भगवा आतंकवाद के रूप में उपजा। गृहमंत्री को स्पष्ट कर देना चाहिए।
आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता उसमें केवल हिंसा का क्रूर, तांडव होता है, जहाँ मानवता कराहती है,इंसानियत मरती है तब जीवन नहीं दरिन्दगी का सैलाब उमड़ पड़ता है। आतंक समूची प्रकृति, समाज, परिवार को खत्म करता है। आतंकी, इंसानी मुखौटा लगाये धरती, अपनी माँ की कोख तक को कलंकित करते हैं। इनका कोई रंग नहीं, धर्म नहीं और इंसानियत से कोई वास्ता नहीं होता।
भगवा वस्त्रों को संतों ने इसलिए धारण किया क्योंकि भगवा शरीर की दूषित भावनाओं को ख़त्म करता है,फिर यह भगवा रंग आतंकवाद का पर्याय कैसे हो सकता है। जीवन से विरक्त होकर सन्यासी बनने वालों ने भगवा बाना को अपनाया। दसवीं सदी में हिन्दुस्थान को एक सूत्र में बांधने वाले शंकराचार्य भगवाधारी थे। जिन्होंने देश की विभिन्न जाति-धर्म की एकता के लिए चार तीर्थों की स्थापना की थी। केदारनाथ,द्वारिका,रामेश्वरम और पुरी में शंकराचार्य की पीठ की महान परंपरा आज भी चल रही है। सिक्खों की बलिदानी परंपरा से हर गुरूद्वारे में भगवा ध्वज आज भी लहराता है।
विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भगवा धारण कर भारतीय संस्कृति को महिमा मंडित किया था। विश्व के महान ओरेटर आचार्य रजनीश ने भगवा धारण कर अमेरिका तक में तहलका मचाया था। हमारे साधू संत भगवा धारण करते हैं जो उन्हें आम आदमी से अलग एक पहचान देता है। भगवाधारी समाज को शुचिता का सन्देश देते हैं और समाज उन्हें आदर सम्मान देता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भगवा ध्वज आन-बान-शान का प्रतीक है। संघ अपने ध्वज तले समाज सेवा का कार्य अहर्निश करता चला आ रहा है। छत्रपति शिवाजी जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी। जिन्होंने अपना पूरा राज- पाट अपने गुरु रामदास जी को सौंप दिया था। रामदास जी ने फिर से शिवाजी को राज्य का अधिकारी बनाया और उन्हें अपना वस्त्र दिया जो शिवाजी के राज्य का भगवा ध्वज बना। शिवाजी की प्रेरणा मानकर डा.हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। संघ का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का रहा है जो आज भी उस पर अडिग है। राजनीतिक तुष्टिकरण से, संतुष्टिकरण से, धार्मिकता ही नहीं मानवता भी कराह उठी है। भगवा से हिन्दू भावनाएं जुड़ी हैं। उनके संत पूज्यनीय हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कह कर उसे रंग देना क्या उचित है। राष्ट्रीय अस्मिता को बरकरार रखने वाले भगवाधारी देश ही नहीं विदेशों में भी मानवता का सन्देश दे रहे हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कहाँ पनप उठा।
भारत की एकता अखण्डता के सूत्र भगवा रंग -वस्त्र में अवगुन्थित राजनीति,सत्ता पर बरक़रार रहने के लिए देश की अस्मिता को ठेस पहुंचाना है, सामाजिकता नहीं है। आमजन की उदार सहिष्णुता कट्टरपंथ के मार्ग पर चल पड़े तो क्या होगा?
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के २०/०९ /१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )
संतों का भगवा वस्त्र आजादी के दीवानों का पर्याय भी बना।बंकिमचंद्र चटर्जी ने भगवा ध्वज तले वन्दे मातरम काअलख जगा आजादी के दीवानों को एक दिशा प्रदान की थी। जहाँ से राष्ट्र के लिए बलिदान की शुरुआत हुई। भगवा रंग आजादी बलिदानी और शुचिता का प्रतीक है। राष्ट्रीय ध्वज में यही भगवा
रंग केशरिया बाना बना है।
गृहमंत्री भगवा आतंकवाद कहकर क्या रंग दे रहे हैं। गृहमंत्री नासमझी में ऐसे वक्तव्य नहीं दे सकते। आखिर वे कौन से तथ्य हैं जहाँ से भगवा आतंकवाद के रूप में उपजा। गृहमंत्री को स्पष्ट कर देना चाहिए।
आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता उसमें केवल हिंसा का क्रूर, तांडव होता है, जहाँ मानवता कराहती है,इंसानियत मरती है तब जीवन नहीं दरिन्दगी का सैलाब उमड़ पड़ता है। आतंक समूची प्रकृति, समाज, परिवार को खत्म करता है। आतंकी, इंसानी मुखौटा लगाये धरती, अपनी माँ की कोख तक को कलंकित करते हैं। इनका कोई रंग नहीं, धर्म नहीं और इंसानियत से कोई वास्ता नहीं होता।
भगवा वस्त्रों को संतों ने इसलिए धारण किया क्योंकि भगवा शरीर की दूषित भावनाओं को ख़त्म करता है,फिर यह भगवा रंग आतंकवाद का पर्याय कैसे हो सकता है। जीवन से विरक्त होकर सन्यासी बनने वालों ने भगवा बाना को अपनाया। दसवीं सदी में हिन्दुस्थान को एक सूत्र में बांधने वाले शंकराचार्य भगवाधारी थे। जिन्होंने देश की विभिन्न जाति-धर्म की एकता के लिए चार तीर्थों की स्थापना की थी। केदारनाथ,द्वारिका,रामेश्वरम और पुरी में शंकराचार्य की पीठ की महान परंपरा आज भी चल रही है। सिक्खों की बलिदानी परंपरा से हर गुरूद्वारे में भगवा ध्वज आज भी लहराता है।
विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भगवा धारण कर भारतीय संस्कृति को महिमा मंडित किया था। विश्व के महान ओरेटर आचार्य रजनीश ने भगवा धारण कर अमेरिका तक में तहलका मचाया था। हमारे साधू संत भगवा धारण करते हैं जो उन्हें आम आदमी से अलग एक पहचान देता है। भगवाधारी समाज को शुचिता का सन्देश देते हैं और समाज उन्हें आदर सम्मान देता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भगवा ध्वज आन-बान-शान का प्रतीक है। संघ अपने ध्वज तले समाज सेवा का कार्य अहर्निश करता चला आ रहा है। छत्रपति शिवाजी जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी। जिन्होंने अपना पूरा राज- पाट अपने गुरु रामदास जी को सौंप दिया था। रामदास जी ने फिर से शिवाजी को राज्य का अधिकारी बनाया और उन्हें अपना वस्त्र दिया जो शिवाजी के राज्य का भगवा ध्वज बना। शिवाजी की प्रेरणा मानकर डा.हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। संघ का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का रहा है जो आज भी उस पर अडिग है। राजनीतिक तुष्टिकरण से, संतुष्टिकरण से, धार्मिकता ही नहीं मानवता भी कराह उठी है। भगवा से हिन्दू भावनाएं जुड़ी हैं। उनके संत पूज्यनीय हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कह कर उसे रंग देना क्या उचित है। राष्ट्रीय अस्मिता को बरकरार रखने वाले भगवाधारी देश ही नहीं विदेशों में भी मानवता का सन्देश दे रहे हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कहाँ पनप उठा।
भारत की एकता अखण्डता के सूत्र भगवा रंग -वस्त्र में अवगुन्थित राजनीति,सत्ता पर बरक़रार रहने के लिए देश की अस्मिता को ठेस पहुंचाना है, सामाजिकता नहीं है। आमजन की उदार सहिष्णुता कट्टरपंथ के मार्ग पर चल पड़े तो क्या होगा?
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के २०/०९ /१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )
सदस्यता लें
संदेश (Atom)