शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

जय अग्रोहा-जय अग्रसेन

अग्रोहा गणराज्य के संस्थापक महाराजा अग्रसेन की गौरव गाथा आज भी कही जाती है। पाँच हजार वर्ष पूर्व एक ऐसा राजा हुआ जिसके राज्य में लोकतंत्र था। दुनिया में असंख्य राजा हुए उनमें महाराजा अग्रसेन ने जो मिसाल कायम की जिससे उनकी कीर्ती पताका समूचे विश्व में फहरा रही है। अग्रसेन जी के राज्य में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली थी। अहिंसा,समर्पण,राष्ट्र प्रेम के साथ अग्रोहा में समाजवाद था। जहाँ हर धर्म,जाति का सम्मान था। अमीरी-गरीबी की विषमता जहाँ नहीं दिखती थी वहाँ के नागरिक व्यापार,कृषि,गोपालन के साथ वीर सिपाही भी थे। आपसी भाईचारा, प्रेम, सदभाव के साथ हर नागरिक देशभक्त था। यह केवल इसलिए कि राजा अग्रसेन ने अपने हर नागरिकों के उत्थान के लिए ऐसी व्यवस्था कायम की थी जिसमें वैभवशाली सुख-शांति विराजमान थी।
अग्रोहा में बसने वालों के हर घर से एक ईंट एक रूपया मिलता था। जहाँ एक लाख परिवार रहते थे। घर और काम शुरू करने के लिए धन की व्यवस्था नागरिक करते थे,क्योंकि यह राजा का आदेश था। अग्रोहा की शासन व्यवस्था,खुशहाली को देखकर अनेक लोग यहाँ बसते गए। राज्य के हर नागरिक के लिए एक ही नियम था,जो एक-दूसरे के हित के लिए तत्पर रहते थे।
महाराजा अग्रसेन ने केवल राज्य ही नहीं किया बल्कि सिद्धांतों को प्रतिस्थापित भी किया। अपने गणराज्य के नागरिकों में दान,धर्म और लोकोपकारिता के लिए प्रेरित किया। अपार शक्ति, वैभव को जनहितार्थ के लिए लगाया। जिन्होंने अपना राज्य अट्ठारह गणों में बांटा और अग्रोहा को राजधानी घोषित किया। महाराजा अग्रसेन के अट्ठारह पुत्र हुए। हर पुत्रों को अलग-अलग गुरुओं से शिक्षा दिलाई। उन्हीं गुरुओं के नाम से अट्ठारह गोत्र बने। अग्रवालों में अट्ठारह गोत्र आज भी हैं।
अग्रवाल जो आज भी दान-धर्म समाज सेवा में सबसे आगे हैं। समाज प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन के पद चिन्हों पर चलकर अग्रवालों ने दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। राष्ट्र सेवा के साथ आपसी भाई चारा की भावना,हर धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा जताने वाले अग्रवाल,जहाँ भी हैं वहाँ पथिकों के लिए धर्मशाला जरुर बनी है। अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्द अग्रवाल शिक्षा संस्थान, पेयजल, अस्पतालों, गोशालाओं के साथ नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं को मुहैया करवाने में आज भी आगे हैं।
आश्विन शुक्ल पक्ष की एकम को महाराजा अग्रसेन जन्में थे। हर वर्ष उनकी जयन्ती मनाकर उनके सिद्धांतों आदर्शों को याद किया जाता है। महाराजा अग्रसेन ने अपने नागरिकों को एवं समाज को जो पथ दिखलाया था उसका ही प्रताप आज अग्रवालों के लिए वरदानी सिद्ध हुआ है। भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश में देशभक्ति,समता, परोपकार की बयार चले तथा हम महाराजा अग्रसेन जी के चरित्र को अपने जीवन में आत्मसात करें,ताकि देश और समाज के लिए हम एक मिसाल बन सके। यही आज के लिए बड़ी जरुरत है। महापुरुषों को याद कर अपने जीवन को सफल ऐसे ही बनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन देश,समाज, नागरिकों की समृद्धि, प्रगति के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे। जिनके सिद्धांतों की ज्योति तले सभी का मार्ग आलोकित हो ऐसी कामना है।

(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के 05/10 /10 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

2 टिप्‍पणियां:

  1. 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ' यानी कि असत्य की ओर नहीं सत्‍य की ओर, अंधकार नहीं प्रकाश की ओर, मृत्यु नहीं अमृतत्व की ओर बढ़ो ।

    दीप-पर्व की आपको ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं ! आपका - अशोक बजाज रायपुर

    जवाब देंहटाएं