शनिवार, 28 अगस्त 2010

कुछ तो शर्म करो...

ब्लागर जगत के मित्रों की शिकायत हो सकती है कि कई दिनों से अपने ब्लॉग में कुछ लिख क्यों नहीं रहा हूँ. कुछ व्यक्तिगत कारणों से व्यस्तता के चलते लिख नहीं पाया इसलिए मेरे बुद्धिजीवी मित्रों का मै क्षमाप्रार्थी हूँ. परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे मन के गुबार मिट गए हैं. इस बीच विश्व के सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश में जो शर्मनाक घटना घटी और उसकी कोई आक्रोशित प्रतिक्रिया भारत की जनता ने प्रगट नहीं की उससे मन व्यथित हो गया और अपनी व्यथा आप लोगों के समक्ष व्यक्त क़र रहा हूँ इस उम्मीद के साथ शायद कोई जयप्रकाश, दीनदयाल,लोहिया के इस देश की चिंता करेगा और सोचेगा अपने स्वार्थ से राष्ट्र हित बड़ा होता है हम मिटते हैं तो राष्ट्र खड़ा होता है:-
देश का अनाज भले ही सड़ जाये मगर उसे गरीब जनता में नहीं बांटा जा सकता. देश की सरकार का यह मानना है. भारत के 30 करोड़ लोग गरीबी,भूख,कुपोषण से बेहाल हैं.इस फटेहाल देश के 787 सांसदों ने अपनी तकदीर खुद लिख ली. सांसदों ने एक झटके में अपना वेतन तीन गुना बढ़ा लिया. यह कोई मजदूर नहीं हैं जिन्हें अपनी मजदूरी बढ़ाने के लिए जुलुस निकालना पड़ता है या कोई आन्दोलन करके लाठी और गोली खाना पड़ता है. ये हमारे देश के चुनिन्दा जन प्रतिनिधि हैं जिन्हें सौ करोड़ से अधिक लोगों ने सरकार बनाने के लिए चुना है.
16 हजार रूपये पाने वाले सांसदों का वेतन 50 हजार रुपया हो गया इस पर हमारे माननीय सांसदों को संतोष नहीं हुआ.संसद भवन में एक नई नौटंकी हुई.संसद को भंग क़र एक नई सरकार बना डाली जिसके संयुक्त प्रधानमंत्री लालूप्रसाद यादव और मुलायमसिंह बने. लोकसभा अध्यक्ष भाजपा के गोपीनाथ मुंडे को बनाया गया. यह नाटक नौटंकी महज इसलिए कि,तिगुनी वेतन वृद्धि भी हमारे सांसदों का पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं है. आखिरकार सांसदों की अनेक सुख सुविधाओं और भत्ते में बढोतरी की गई.
भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी ने सांसदों के ऐसे रवैये पर विरोध जाहिर किया, मगर सांसदों के नक्कार खाने में आडवाणी की तूती फीकी पड़ गयी. हमारे जन प्रतिनिधि ही ऐसे हैं जो अपनी तनख्वाह,भत्ता,सुविधा खुद तय क़र लेते हैं आखिर वे सरकार जो ठहरे. ऐसा करते वे तनिक भी शर्मिंदा नहीं होते बल्कि देश की जनता का सिर शर्म से झुक जाता है जिन्होंने खुद उनको चुन क़र भेजा है.
सांसदों ने जनता के लिए नहीं बल्कि अपनी खिचड़ी खुद पकाई और भरपूर घी भी डाल लिया.50 हजार रुपया महीना वेतन के अलावा सांसद कार्यालय की खर्च सीमा 20 हजार रूपए से दूना क़र 40 हजार हो गयी.निर्वाचन क्षेत्र के भत्ते को 20 हजार से बढाकर 40 हजार रूपये क़र दिया.निजी वाहन खरीदने के लिए 1 लाख रूपये ब्याज मुक्त ऋण बढकर 4 लाख हो गया. सांसदों द्वारा उपयोग में आने वाले वाहनों की रोड माइलेज 13 रूपये से बढकर 16 रूपये प्रति किलोमीटर क़र दी गई. पेंशन लाभ 8 हजार रूपये से बढकर 20 हजार हो गई.साल भर में सांसद को 1 लाख 50 हजार मुफ्त फोन काल की सुविधा के साथ तीन लैंड लाइन और 2 मोबाईल मुफ्त मिलेंगे. मुफ्त आवास की सुविधा के साथ सरकार 60 हजार का फर्नीचर भी देगी. साल भर में 50 हजार यूनिट बिजली भी मुफ्त.
लोकसभा, राज्यसभा के सांसदों के केवल वेतन पर साल भर में 13 करोड़ 76 लाख खर्च होते हैं और अब 62 करोड़ 50 लाख 75 हजार 796 रूपये का भार संसदीय बजट पर पड़ेगा. सचिवों से एक रुपया अधिक वेतन की मांग करने वाले सांसदों को यह गुमान नहीं है कि वे जनता के चुने हुए जन प्रतिनिधि हैं. वेतन भोगी कर्मचारी नहीं. जनता ने उन्हें जन सेवा के लिए भेजा और उन्होंने जन सेवा के नाम पर घर घर जाकर वोट माँगा है.
देश की लोकसभा और राज्यसभा में 787 सांसदों पर 172 करोड़ रुपया का खर्च आता है जहाँ हमारे सांसद उंघते हैं, कोई चिल्लाता है,कोई लड़ता है मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी एक मत नहीं होते. मगर अपने स्वार्थ के लिए सभी एक स्वर में चिल्ला रहे थे और फिर भी संतुष्ट नहीं हुए. ऐसे में भला देश की गरिमा,अस्मिता की बागडोर थामने वाले हमारे सांसद किसका भला करेंगे. ऐसे में कवि धूमिल की पंक्तियाँ याद आती हैं जिन्होंने लिखा है-
एक आदमी रोटी बेलता है
दूसरा आदमी रोटी सेंकता है
तीसरा आदमी रोटी से खेलता है
यह तीसरा आदमी कौन
मेरे देश की संसद मौन