छत्तीसगढ़ में बढती औद्योगिकी गतिविधियों से आम जन जीवन त्रस्त हो उठा है। विपुल संसाधन, एवं सस्ते श्रम ने औद्योगिक परिवेश को गति तो दी मगर संस्टेबल डेवलपमेंट (टिकाऊ विकास) की ओर कोई ध्यान नहीं दियागया। रायगढ़ से राजधानी रायपुर सहित बस्तर जैसे सुदूर क्षेत्र में औद्योगिक प्रदूषण की मार से कई समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। रायपुर का नाम देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहर की सूची में आ चुका। बस्तर की डंकनी -शंखनी नदी देश की सबसे अधिक प्रदूषित नदी बन चुकी है। राज्य की सभी नदियों का कमोवेश यही हश्र हो रहा है। ताप आधारित पावर प्लांट की बाढ़ से भले ही उर्जा के मामले में राज्य आत्म निर्भर दिख रहा है मगर फ्लाई एश के सुरक्षित निपटाने के लिए ठोस कदम व्यवहारिक नहीं हो सके हैं। राज्य में उद्योगों के असंतुलित विकास से अनेक बुनियादी सुविधाएँ आम आदमी से छिनती नज़र आ रहीं हैं। जिसमें नदी सहित भू जल स्तर गिरा है तो कहीं वायु प्रदूषण से बीमारियाँ फैलने का खतरा मंडरा रहा है , विषाक्त औद्योगिक जल खुले आम जल श्रोतों में बहाया जा रहा है। राजधानी रायपुर में जब तब बरसती कालिख से जन जीवन व्यथित हो उठा है। औद्योगिक प्रदूषण फैलने वाले उद्योग आखिर क्यों पर्यावरण के खिलाफ काम करने में डरते नहीं हैं। यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।
मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ में अब और उद्योग नहीं लगाये जायेंगे। यह स्वागत योग्य फैसला है।
विधान सभा में स्थानीय शासन ,परिवहन व पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत की पहल पर अशासकीय संकल्प पारित हुआ यह प्रदूषण के खिलाफ अच्छी शुरुवात है। ठोस अपशिष्ट फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ कठोर कदम उठाने के लिए सरकार कृत संकल्प दिख पड़ रही है, वहीँ इससे सम्बन्धित कुटीर उद्योगों को मूर्त रूप देने की कार्ययोजना बेहतर पहल है। औद्योगिक विकास इस गति से न हो कि वह भस्मासुर साबित होने लगे। छत्तीसगढ़ में उद्योगों का समन्वित विकास हो वहीँ लघु व कुटीर उद्योगों को बढावा देकर एक अच्छी शुरुवात हो सकती है।
नारायण भूषणिया
शनिवार, 31 जुलाई 2010
फैसला स्वागत योग्य
शनिवार, 24 जुलाई 2010
क्या शहीद चंद्रशेखर आज़ाद को हम भुला देंगे ?
शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म २३ जुलाई १९०६ को म.प्र.के झाबुआ जिले के भावरा गाँव में पंडित सीताराम तिवारी के घर हुआ था। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था।
कल २३ जुलाई को मन में यह भाव उठा कि,आज उस महान शहीद की कोई प्रतिमा इस छत्तीसगढ़ की राजधानी में ढूँढें और उस पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाये तथा अपने अखब़ार 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ 'में यह जानकारी छापी जाए । राज़धानी में एक चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड है तथा एक आज़ाद चौक भी है यह हमें मालूम था। मैं 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़' में अपनी सहयोगी अर्चना हुखरे के साथ शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की मूर्ति की तलाश में निकल पड़ा। मठ पुरेना क्षेत्र जो वर्तमान में चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड के नाम से जाना जाता है। स्वाभाविक रूप से वहां शहीद आज़ाद की मूर्ति होगी,यह विचार मन में आया,हम वहां गए और पता भी लगाया पर वहां कोई भी मूर्ति नहीं मिली।
फिर हम आज़ाद चौक गए तो सबसे बड़ा आश्चर्य ये हुआ कि,आज़ाद चौक के नाम से जो चौक है,वहां प्रतिमा गाँधी जी की लगी हुई है। कुछ पुराने जानकारों से एवं अन्य विश्वस्त सूत्रों से जानकारी मिली कि,गाँधी जी की मूर्ति वाले इस चौक का आज़ाद चौक नाम १४ वर्षीय बलीराम आजाद की स्मृति में रखा गया था। बलीराम आजाद ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वानर सेना बनाई थी।बलीराम जी के बारे में और कोई ज्यादा जानकारी तत्क्षण नहीं मिल पाई और यह हमारा कल का विषय भी नहीं था।
आज़ाद चौक पर लगी गाँधी जी की मूर्ति को बनवाने का श्रेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कमलनारायण शर्मा को जाता है। उन दिनों पंडित रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री थे। प्रशासन मुख्यमंत्री शुक्ल से उद्धघाटन कराना चाहता था किन्तु कमलनारायण शर्मा इसके लिए तैयार नहीं हुए।
उन दिनों राष्ट्रपति डा.राजेन्द्रप्रसाद रायपुर आने वाले थे।श्री शर्मा डा.राजेन्द्रप्रसाद के कर कमलों से मूर्ति का उद्धघाटन कराना चाहते थे। मुख्यमंत्री शुक्ल प्रतिमा को देखने आये। सरकार और राष्ट्रपति को खबर दी गई कि,मूर्ति गाँधी जी जैसी नहीं दिखती है। इससे विवाद निर्मित हो गया।
१४ सितम्बर १९५६ को महामहिम राष्ट्रपति जी आने वाले थे,इसके पूर्व १३ सितम्बर की शाम को कमलनारायण शर्मा और रामसहाय तिवारी ने एक हरिजन की बेटी से प्रतिमा का
उद्धघाटन करा दिया। बाद में इस हरिजन बेटी ने महामहिम को माला भी पहनाई थी।
ये तो हुई गाँधी प्रतिमा वाले आज़ाद चौक की कहानी।
हमें बहुत दुःख और गुस्सा भी आया कि,रायपुर में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की एक भी प्रतिमा नहीं लगी है।
हमने चंद्रशेखर आज़ाद के चित्र पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
मेरी उन साथियों से आग्रह है जो ये मानते हैं कि,भारत को आज़ादी दिलाने में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का भी अतुलनीय योगदान है,तो अपने अपने स्तर पर उन्हें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहीद आज़ाद की स्मृति में बनाये गए वार्ड में उनकी भव्य प्रतिमा लगवाकर उनकी आने वाली पुण्य तिथि २७ फ़रवरी को उद्धघाटन करवाने का प्रयास करना चाहिए।
नारायण भूषणिया
कल २३ जुलाई को मन में यह भाव उठा कि,आज उस महान शहीद की कोई प्रतिमा इस छत्तीसगढ़ की राजधानी में ढूँढें और उस पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाये तथा अपने अखब़ार 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ 'में यह जानकारी छापी जाए । राज़धानी में एक चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड है तथा एक आज़ाद चौक भी है यह हमें मालूम था। मैं 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़' में अपनी सहयोगी अर्चना हुखरे के साथ शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की मूर्ति की तलाश में निकल पड़ा। मठ पुरेना क्षेत्र जो वर्तमान में चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड के नाम से जाना जाता है। स्वाभाविक रूप से वहां शहीद आज़ाद की मूर्ति होगी,यह विचार मन में आया,हम वहां गए और पता भी लगाया पर वहां कोई भी मूर्ति नहीं मिली।
फिर हम आज़ाद चौक गए तो सबसे बड़ा आश्चर्य ये हुआ कि,आज़ाद चौक के नाम से जो चौक है,वहां प्रतिमा गाँधी जी की लगी हुई है। कुछ पुराने जानकारों से एवं अन्य विश्वस्त सूत्रों से जानकारी मिली कि,गाँधी जी की मूर्ति वाले इस चौक का आज़ाद चौक नाम १४ वर्षीय बलीराम आजाद की स्मृति में रखा गया था। बलीराम आजाद ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वानर सेना बनाई थी।बलीराम जी के बारे में और कोई ज्यादा जानकारी तत्क्षण नहीं मिल पाई और यह हमारा कल का विषय भी नहीं था।
आज़ाद चौक पर लगी गाँधी जी की मूर्ति को बनवाने का श्रेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कमलनारायण शर्मा को जाता है। उन दिनों पंडित रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री थे। प्रशासन मुख्यमंत्री शुक्ल से उद्धघाटन कराना चाहता था किन्तु कमलनारायण शर्मा इसके लिए तैयार नहीं हुए।
उन दिनों राष्ट्रपति डा.राजेन्द्रप्रसाद रायपुर आने वाले थे।श्री शर्मा डा.राजेन्द्रप्रसाद के कर कमलों से मूर्ति का उद्धघाटन कराना चाहते थे। मुख्यमंत्री शुक्ल प्रतिमा को देखने आये। सरकार और राष्ट्रपति को खबर दी गई कि,मूर्ति गाँधी जी जैसी नहीं दिखती है। इससे विवाद निर्मित हो गया।
१४ सितम्बर १९५६ को महामहिम राष्ट्रपति जी आने वाले थे,इसके पूर्व १३ सितम्बर की शाम को कमलनारायण शर्मा और रामसहाय तिवारी ने एक हरिजन की बेटी से प्रतिमा का
उद्धघाटन करा दिया। बाद में इस हरिजन बेटी ने महामहिम को माला भी पहनाई थी।
ये तो हुई गाँधी प्रतिमा वाले आज़ाद चौक की कहानी।
हमें बहुत दुःख और गुस्सा भी आया कि,रायपुर में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की एक भी प्रतिमा नहीं लगी है।
हमने चंद्रशेखर आज़ाद के चित्र पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
मेरी उन साथियों से आग्रह है जो ये मानते हैं कि,भारत को आज़ादी दिलाने में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का भी अतुलनीय योगदान है,तो अपने अपने स्तर पर उन्हें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहीद आज़ाद की स्मृति में बनाये गए वार्ड में उनकी भव्य प्रतिमा लगवाकर उनकी आने वाली पुण्य तिथि २७ फ़रवरी को उद्धघाटन करवाने का प्रयास करना चाहिए।
नारायण भूषणिया
सोमवार, 19 जुलाई 2010
जगदीश उपासने को पितृ शोक
रायपुर १९ जुलाई , आज भाई जगदीश उपासने के पिताश्री दत्तात्रय उपासने का ८७ वर्ष कि आयु में निधन हो गया।उपासने परिवार रायपुर का या यूँ कहा जाये सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का एकमात्र ऐसा परिवार है जिसने आपातकाल में सबसे ज्यादा पीड़ा झेली है। बाबूजी एवम आई (श्रीमती रजनी ताई उपासने ) ने वो १९ महीने कैसे घर में काटे होंगे जब उनके तीन-तीन बेटे मीसा के काले कानून में जेल में बंद कर दिए गए थे। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सच्चिदानंद उपासने तो उस समय मात्र १८ वर्ष के ही थे जब उन्होंने १९ माह की जेल काटी।
बाबूजी तो शारीरिक रूप में आपातकाल के दौरान ही कमजोर होने लगे थे पर लोकतंत्र पर हुए प्रहार के विरोध में अपने बेटों के द्वारा किये गए सत्याग्रह से उनका सीना गर्व से फूला रहता था और फिर ममतामयी मां रजनी ताई का भी तो ध्यान रखना था,आखिर उस माँ पर क्या गुजरती होगी जिसके बेटे बिना किसी अपराध के जेल में हो . इस प्रकार की मानसिक पीड़ा को झेलते बाबूजी का स्वास्थ्य कमजोर होता रहा और वे जिन्दगी की हर जंग को लड़ते लड़ते आज मौत से हार गए .
आज शाम ५ बजे रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में उनका नश्वर शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया . उनके अंतिम समय में अस्पताल में मुख्यमंत्री डा.रमनसिंह उपस्थित थे तथा अंतिम संस्कार के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ट शांताराम जी ,दिनकर भाकरे ,मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ,खनिज निगम के अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल,गृह निर्माण मंडल केअध्यक्ष सुभाष राव ,सांसदरमेश बैस,भाजपा,आर .एस .एस.,विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं
सहित शहर के सभी वरिष्ट पत्रकार गणों ने उपस्थित होकर स्वर्गीय दत्तात्रेय उपासने को श्रद्धांजली अर्पित की.
मेरी ईश्वर से यह प्रार्थना है कि,अतिपूज्य ताई तथा सम्पूर्ण उपासने परिवार को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें .ॐ शांतिः शांतिः शांतिः -नारायण भूषणिया
बाबूजी तो शारीरिक रूप में आपातकाल के दौरान ही कमजोर होने लगे थे पर लोकतंत्र पर हुए प्रहार के विरोध में अपने बेटों के द्वारा किये गए सत्याग्रह से उनका सीना गर्व से फूला रहता था और फिर ममतामयी मां रजनी ताई का भी तो ध्यान रखना था,आखिर उस माँ पर क्या गुजरती होगी जिसके बेटे बिना किसी अपराध के जेल में हो . इस प्रकार की मानसिक पीड़ा को झेलते बाबूजी का स्वास्थ्य कमजोर होता रहा और वे जिन्दगी की हर जंग को लड़ते लड़ते आज मौत से हार गए .
आज शाम ५ बजे रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में उनका नश्वर शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया . उनके अंतिम समय में अस्पताल में मुख्यमंत्री डा.रमनसिंह उपस्थित थे तथा अंतिम संस्कार के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ट शांताराम जी ,दिनकर भाकरे ,मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ,खनिज निगम के अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल,गृह निर्माण मंडल केअध्यक्ष सुभाष राव ,सांसदरमेश बैस,भाजपा,आर .एस .एस.,विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं
सहित शहर के सभी वरिष्ट पत्रकार गणों ने उपस्थित होकर स्वर्गीय दत्तात्रेय उपासने को श्रद्धांजली अर्पित की.
मेरी ईश्वर से यह प्रार्थना है कि,अतिपूज्य ताई तथा सम्पूर्ण उपासने परिवार को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें .ॐ शांतिः शांतिः शांतिः -नारायण भूषणिया
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
क्या ये वही रायपुर है ?
किसी भी काम को करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति का होना जरुरी है और यह कर दिखाया है राजधानी रायपुर के नवनियुक्त पुलिस एस.पी. दीपांशु काबरा ने. रायपुर नगर जब से छत्तीसगढ़ की राजधानी बना तबसे यहाँ आबादी का यातायात पर भारी दबाव पड़ा तथा भयमुक्त वातावरण बनाने के चक्कर में यह नगर उद्दण्ड एवम अनुशासनहीन नागरिकों का नगर बन कर रह गया है.यातायात के नियमों को तोड़ने में नेता,नागरिक,अधिकारी,छात्र,आदि सब में होड़ मच गई तथा सभी नियमों को तोड़ने में ही अपनी शान समझने लगे,ऐसे में वे नागरिक जो अनुशासित जीवन जीने के आदी हैं उन्हें सर्वाधिक परेशान होना पड़ रहा था. ऐसे समय में दीपांशु काबरा ने सफलता अर्जित की. पूरे शहर में यातायात व्यवस्था चुस्त दुरुस्त नजर आने लगी है पर बड़े व्यावसायिक काम्प्लेक्स तथा बाजार वालों ने पार्किंग स्थलों को घेर रखा है उन्हें खाली कराने की और जरुरत है.
शहर की हर व्यस्ततम सड़कों पर चलना आसान हो गया है. बरसों से स्टेशन रोड,मालवीय रोड गोल बाजार,बंजारी रोड,मौदहापारा,सदर बाजार,रामसागरपारा आदि की यातायात व्यवस्था चरमराई हुई थी,इन मार्गों पर पुलिस की पैनी नजर इन दिनों लगी हुई है जो सुखद लग रही है. सडकों पर लगने वाले बाजारों से सड़कें मुक्त हो रही हैं.
यातायात व्यवस्था को बनाने के लिए पुलिस का अभियान सतत बना हुआ है,इस उपलब्धि के लिए राजधानी के दोनों मंत्रीगण बृजमोहन अग्रवाल एवम राजेश मूणत बधाई के पात्र हैं जिन्होंने बिना किसी राजनितिक हस्तक्षेप के एस.पी.को फ्री हैण्ड दिया.
रेलवे स्टेशन की यातायात व्यवस्था भी सुधरती दिख रही है.यात्रियों के लिए प्री पैड ऑटो बूथ जो मरणासन्न हो गया था अब चुस्त दुरुस्त हो गया है.लाउडस्पीकर द्वारा ऑटो वाहनों को निर्देश से पैदल चलने वालों की मुसीबते ख़त्म हो गई हैं.
कुछ सुधार अभी अपेक्षित हैं जिसमें भीड़ भाड़ वाले क्षेत्रों में सड़क के किनारे शराब दुकानों से ट्रैफिक समस्या गंभीर हो रही है,इसके लिए नगरनिगम,आबकारी विभाग सहित पुलिस प्रशासन को विशेष ध्यान देना चाहिए.जहाँ शराब खरीदने और पीने वालों की भीड़ से छुटपुट वारदातें घटती रहती है.इस प्रकार की गंभीर स्थिति रेलवे स्टेशन के सामने,शास्त्री बाजार,पंडरी मेन रोड,खमतराई,भानपूरी आदि स्थानों पर देखी जा सकती है.
बहरहाल रायपुर को एक कुशल अधिकारी की जरुरत थी जिसकी पूर्ति काबरा कर रहे हैं.पुलिस की मुस्तैदी सतत चलती रहेगी तभी यहाँ की व्यवस्था में सुधार आएगा.पैदल चलने वाले राहत महसूस कर रहे हैं फिर भी उन्हें नियमों से बांधना जरुरी है.वहीँ अवैध वसूली का भय अब नहीं रहा यह एक शुभ संकेत है.
शहर की हर व्यस्ततम सड़कों पर चलना आसान हो गया है. बरसों से स्टेशन रोड,मालवीय रोड गोल बाजार,बंजारी रोड,मौदहापारा,सदर बाजार,रामसागरपारा आदि की यातायात व्यवस्था चरमराई हुई थी,इन मार्गों पर पुलिस की पैनी नजर इन दिनों लगी हुई है जो सुखद लग रही है. सडकों पर लगने वाले बाजारों से सड़कें मुक्त हो रही हैं.
यातायात व्यवस्था को बनाने के लिए पुलिस का अभियान सतत बना हुआ है,इस उपलब्धि के लिए राजधानी के दोनों मंत्रीगण बृजमोहन अग्रवाल एवम राजेश मूणत बधाई के पात्र हैं जिन्होंने बिना किसी राजनितिक हस्तक्षेप के एस.पी.को फ्री हैण्ड दिया.
रेलवे स्टेशन की यातायात व्यवस्था भी सुधरती दिख रही है.यात्रियों के लिए प्री पैड ऑटो बूथ जो मरणासन्न हो गया था अब चुस्त दुरुस्त हो गया है.लाउडस्पीकर द्वारा ऑटो वाहनों को निर्देश से पैदल चलने वालों की मुसीबते ख़त्म हो गई हैं.
कुछ सुधार अभी अपेक्षित हैं जिसमें भीड़ भाड़ वाले क्षेत्रों में सड़क के किनारे शराब दुकानों से ट्रैफिक समस्या गंभीर हो रही है,इसके लिए नगरनिगम,आबकारी विभाग सहित पुलिस प्रशासन को विशेष ध्यान देना चाहिए.जहाँ शराब खरीदने और पीने वालों की भीड़ से छुटपुट वारदातें घटती रहती है.इस प्रकार की गंभीर स्थिति रेलवे स्टेशन के सामने,शास्त्री बाजार,पंडरी मेन रोड,खमतराई,भानपूरी आदि स्थानों पर देखी जा सकती है.
बहरहाल रायपुर को एक कुशल अधिकारी की जरुरत थी जिसकी पूर्ति काबरा कर रहे हैं.पुलिस की मुस्तैदी सतत चलती रहेगी तभी यहाँ की व्यवस्था में सुधार आएगा.पैदल चलने वाले राहत महसूस कर रहे हैं फिर भी उन्हें नियमों से बांधना जरुरी है.वहीँ अवैध वसूली का भय अब नहीं रहा यह एक शुभ संकेत है.
सोमवार, 5 जुलाई 2010
ये आखिर क्यों...?
फिर से छत्तीसगढ़ के नारायणपुर से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर भारतमाता के सपूतों को इस देश के ही कपूतों ने मौत की नींद सुला दिया। 27 नौजवान शहीद हो गए और 15 घायल।
क्या हो गया इस देश को? राष्ट्र की सीमाओं पर विदेशियों से अपने देश की रक्षा करते हुए जितने लाल शहीद नहीं हुए होंगे, उससे अधिक अपनी ही धरती पर अपने ही भटके हुए भाइयों के द्वारा मारे गए।
नक्सलवाद के नाम पर चल रहे आतंकवाद को नेस्तनाबूत करने के लिए कब जागेगी केंद्र सरकार?जो सरकार अपने देश के भीतर घुसे देशद्रोहियों को समाप्त करने में असफल हो रही है वो सरकार विदेशियों से कैसे देश की सीमाओं की रक्षा कर सकेगी ?
आखिर केंद्र सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है जो नक्सली हमले से निपटने में नाकाम होने का सारा दोष राज्य सरकारों पर मढ़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है।
आखिर क्यों ? नक्सली आतंकवाद के खिलाफ सेना का इस्तमाल करने के मामले में केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में मतभेद उजागर होते हैं? पशुपति से तिरुपति तक के कारीडोर में सशक्त हुए माओवादियों के पोषक तत्व कहीं केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में तो नहीं बैठे हैं ?
110 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में क्या कोई लोहपुरुष नहीं है जो इस राष्ट्र का नेतृत्व कर इन समस्याओं से देश की जनता को उबारे ?
कुछ लोगों का कहना है कि नक्सलवाद के पीछे चीन का हाथ है। अगर यह सही है तो कभी क्या ऐसा नहीं हो सकता कि,चीन 1962 की तरह हमारी सीमाओं पर आक्रमण करे और सेना देश की रक्षा के लिए उनसे लड़े और उसी समय भारत के 12 राज्यों में फैले माओवादियों बनाम नक्सलवादियों बनाम आतंकवादियों द्वारा कहीं देश के भीतर तथाकथित क्रांति शुरू कर दी गई तब क्या होगा ?
क्या हम उस समय भी सेना का इस्तमाल नहीं करेंगे? क्या नक्सलवादियों की यह लड़ाई किसी युद्ध से कम है ? यदि इसे हम युद्ध की तरह नहीं लेंगे तो ऐसा न हो कि इस धरती से कहीं कोई और देश का उदय हो जाये ?और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का धर्म निभाने वाले मंत्री,नेता तथा मोमबत्ती जलाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करके फोटो छपाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी देखते रह जायेंगे।
देश की 80 प्रतिशत जनता इस लड़ाई के कारण को समझ ही नहीं पा रही है और आये दिन समाचारपत्रों में आई खबरों को पढ़कर आकाश की ओर भगवान को ताकते हुए पूछती है ये आखिर क्यों...?
क्या हो गया इस देश को? राष्ट्र की सीमाओं पर विदेशियों से अपने देश की रक्षा करते हुए जितने लाल शहीद नहीं हुए होंगे, उससे अधिक अपनी ही धरती पर अपने ही भटके हुए भाइयों के द्वारा मारे गए।
नक्सलवाद के नाम पर चल रहे आतंकवाद को नेस्तनाबूत करने के लिए कब जागेगी केंद्र सरकार?जो सरकार अपने देश के भीतर घुसे देशद्रोहियों को समाप्त करने में असफल हो रही है वो सरकार विदेशियों से कैसे देश की सीमाओं की रक्षा कर सकेगी ?
आखिर केंद्र सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है जो नक्सली हमले से निपटने में नाकाम होने का सारा दोष राज्य सरकारों पर मढ़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है।
आखिर क्यों ? नक्सली आतंकवाद के खिलाफ सेना का इस्तमाल करने के मामले में केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में मतभेद उजागर होते हैं? पशुपति से तिरुपति तक के कारीडोर में सशक्त हुए माओवादियों के पोषक तत्व कहीं केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में तो नहीं बैठे हैं ?
110 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में क्या कोई लोहपुरुष नहीं है जो इस राष्ट्र का नेतृत्व कर इन समस्याओं से देश की जनता को उबारे ?
कुछ लोगों का कहना है कि नक्सलवाद के पीछे चीन का हाथ है। अगर यह सही है तो कभी क्या ऐसा नहीं हो सकता कि,चीन 1962 की तरह हमारी सीमाओं पर आक्रमण करे और सेना देश की रक्षा के लिए उनसे लड़े और उसी समय भारत के 12 राज्यों में फैले माओवादियों बनाम नक्सलवादियों बनाम आतंकवादियों द्वारा कहीं देश के भीतर तथाकथित क्रांति शुरू कर दी गई तब क्या होगा ?
क्या हम उस समय भी सेना का इस्तमाल नहीं करेंगे? क्या नक्सलवादियों की यह लड़ाई किसी युद्ध से कम है ? यदि इसे हम युद्ध की तरह नहीं लेंगे तो ऐसा न हो कि इस धरती से कहीं कोई और देश का उदय हो जाये ?और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का धर्म निभाने वाले मंत्री,नेता तथा मोमबत्ती जलाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करके फोटो छपाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी देखते रह जायेंगे।
देश की 80 प्रतिशत जनता इस लड़ाई के कारण को समझ ही नहीं पा रही है और आये दिन समाचारपत्रों में आई खबरों को पढ़कर आकाश की ओर भगवान को ताकते हुए पूछती है ये आखिर क्यों...?
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