अगर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका नहीं लगाई जाती तो 2 जी स्पेक्ट्रम का घोटाला उजागर नहीं होता। उत्तरप्रदेश में 2001 से गरीबों के अनाज को सत्ता के दलालों, भ्रष्ट अधिकारियों ने विदेशों में बेच दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की वह गौर करने लायक है। यह मामला भी एक जनहित याचिका के कारण सामने आया। ऐसे कई मामले हैं जो प्रजातंत्र को खोखला करते हैं सामने नहीं आ सके तो उस पर जाँच और कार्यवाही होना तो दूर की बात है।
संसद का शीतकालीन अधिवेशन भ्रष्टाचार के खिलाफ जाँच की मांग पर भेंट चढ़ गया।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चुप्पी ही साध ली। अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो जाँच के लिए सरकार तैयार क्यूँ नहीं होती। दरअसल राजनीति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि उसे सत्य को तनिक भी स्वीकार करने का साहस नहीं है। जहाँ ईमान दम तोड़ चुका है। शर्म हया तक को ताक में रख दिया गया। जहाँ इंसान के नाम पर खून चूसने वाले भयावह चेहरे ही हैं। इनकी असलियत बाहर न आये इसका ही इन्हें भय है। भ्रष्टाचार की दलदल में पनपने वाली राजनीति के कद्दावर चेहरे मानवता के प्रबल शत्रु बन चुके हैं। प्रजातांत्रिक देश के लिए इससे ज्यादा शर्मसार बात क्या होगी? जिन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना वे ही जनता के खून पसीने की कमाई से अपने एशो आराम के साधन जुटा रहे हैं। सार्वजनिक तौर पर अपने आप को हरिश्चन्द्र की प्रतिमूर्ति बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहें हैं।
आम जनता महंगाई के बोझ तले नारकीय जीवन जी रही है। भ्रष्टाचार के दलालों के कारण अपनी इज्जत भी खो रही है, जिसका सब कुछ छिना जा रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आम आदमी का हौसला बढ़ाया है वह काबिले तारीफ है। अगर अब भी जनता नहीं जागी तो उसके साथ और अधिक बुरा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने जिस गंभीरता के साथ 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में सरकार को आड़े हाथ लिया और जाँच के लिए मजबूर भी कर दिया। संचार मंत्री ए. राजा का मंत्री पद छिन गया। मगर राष्ट्र मंडल खेलों में भ्रष्टाचार का खिलाड़ी कलमाडी की चमड़ी क्यों बचाई जा रही है आखिर उसके खैरख्वाह कौन हैं , इसके लिए आम जनता को मांग करनी चाहिए।
चूहे चाहते हैं कि बिल्ली उन्हें पकड़ नहीं सके। मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे यह प्रश्न चूहों के लिए भले आज भी अनुत्तरित होगा पर भारत की आम जनता के हाथों में कई अधिकार हैं। सूचना का अधिकार और जनहित याचिकाओं के माध्यम से कोई भी आम आदमी देश के गद्दारों को बेनकाब कर सकता है। भारत की सारी जनता चूहा नहीं है मगर अधिकांश की सोच के कारण ही देश में भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और अधिकारियों का बोलबाला बढ़ रहा है। जनता केवल जनप्रतिनिधियों को चुन कर अपने भाग्य का फैसला करने वाली चाबी को उन्हें सौंप देना काफी नहीं है। आदमी को अपने दायरे में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ डट कर मुकाबला करना चाहिए। जो ऐसा करते हैं उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। नहीं तो आने वाले दिनों में भ्रष्ट परजीवी इतने विशाल हो जायेंगे कि उनके खिलाफ कोई हथियार कारगर नहीं हो सकेगा।
भ्रष्टाचार और घोटालों को दबाने के लिए कई राजनितिक चालें चली जाती हैं। अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है। आतंकवादी वारदातें बढ जाती हैं। जनता का ध्यान भटक जाये और मुद्दे की बात से वह भटक जाये ऐसा ही होता रहा है। अगर जनता ऐसी भ्रष्ट राजनीति कुचक्र को समझ ले तो बेहतर होगा। उसे भ्रष्टाचार घोटालों के खिलाफ कमर कसना होगा।
घूस जो अब दस्तूर बन रही है वह हमारी अपनी कमजोरी है उसे दूर करने के लिए सभी को एक जुट होना होगा तभी उज्जवल भारत की वह तस्वीर उभरेगी जिसका सपना देश के शहीदों ने देखा था। आस्तीनों में पल रहे सापों को मारने के लिए खुद को पहल करनी होगी। ऐसा संकल्प देश के हर गाँव-कस्बों में थोड़े ही लोग लेलें तो देश की संसद का यह हश्र देखने को नहीं मिलेगा जो संसद के शीतकालीन सत्र में देखने को मिला। ( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के 20/12/2010 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )