वैराग्य,सन्यास,के भगवा रंग को राजनीति के चलते आतंकी करार दे दिया।देश की युवा पीढ़ी "भगवा आतंकवाद" का शिकार हो रही है। गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने देश के पुलिस प्रमुखों की बैठक में आतंकवाद को एक रंग दे दिया। विडम्बना पूर्ण गृहमंत्री का ऐसा बयान भावनाओं को आहत करने वाला है जो भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर भी एक मर्मान्तक प्रहार है।
संतों का भगवा वस्त्र आजादी के दीवानों का पर्याय भी बना।बंकिमचंद्र चटर्जी ने भगवा ध्वज तले वन्दे मातरम काअलख जगा आजादी के दीवानों को एक दिशा प्रदान की थी। जहाँ से राष्ट्र के लिए बलिदान की शुरुआत हुई। भगवा रंग आजादी बलिदानी और शुचिता का प्रतीक है। राष्ट्रीय ध्वज में यही भगवा
रंग केशरिया बाना बना है।
गृहमंत्री भगवा आतंकवाद कहकर क्या रंग दे रहे हैं। गृहमंत्री नासमझी में ऐसे वक्तव्य नहीं दे सकते। आखिर वे कौन से तथ्य हैं जहाँ से भगवा आतंकवाद के रूप में उपजा। गृहमंत्री को स्पष्ट कर देना चाहिए।
आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता उसमें केवल हिंसा का क्रूर, तांडव होता है, जहाँ मानवता कराहती है,इंसानियत मरती है तब जीवन नहीं दरिन्दगी का सैलाब उमड़ पड़ता है। आतंक समूची प्रकृति, समाज, परिवार को खत्म करता है। आतंकी, इंसानी मुखौटा लगाये धरती, अपनी माँ की कोख तक को कलंकित करते हैं। इनका कोई रंग नहीं, धर्म नहीं और इंसानियत से कोई वास्ता नहीं होता।
भगवा वस्त्रों को संतों ने इसलिए धारण किया क्योंकि भगवा शरीर की दूषित भावनाओं को ख़त्म करता है,फिर यह भगवा रंग आतंकवाद का पर्याय कैसे हो सकता है। जीवन से विरक्त होकर सन्यासी बनने वालों ने भगवा बाना को अपनाया। दसवीं सदी में हिन्दुस्थान को एक सूत्र में बांधने वाले शंकराचार्य भगवाधारी थे। जिन्होंने देश की विभिन्न जाति-धर्म की एकता के लिए चार तीर्थों की स्थापना की थी। केदारनाथ,द्वारिका,रामेश्वरम और पुरी में शंकराचार्य की पीठ की महान परंपरा आज भी चल रही है। सिक्खों की बलिदानी परंपरा से हर गुरूद्वारे में भगवा ध्वज आज भी लहराता है।
विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भगवा धारण कर भारतीय संस्कृति को महिमा मंडित किया था। विश्व के महान ओरेटर आचार्य रजनीश ने भगवा धारण कर अमेरिका तक में तहलका मचाया था। हमारे साधू संत भगवा धारण करते हैं जो उन्हें आम आदमी से अलग एक पहचान देता है। भगवाधारी समाज को शुचिता का सन्देश देते हैं और समाज उन्हें आदर सम्मान देता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भगवा ध्वज आन-बान-शान का प्रतीक है। संघ अपने ध्वज तले समाज सेवा का कार्य अहर्निश करता चला आ रहा है। छत्रपति शिवाजी जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी। जिन्होंने अपना पूरा राज- पाट अपने गुरु रामदास जी को सौंप दिया था। रामदास जी ने फिर से शिवाजी को राज्य का अधिकारी बनाया और उन्हें अपना वस्त्र दिया जो शिवाजी के राज्य का भगवा ध्वज बना। शिवाजी की प्रेरणा मानकर डा.हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। संघ का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का रहा है जो आज भी उस पर अडिग है। राजनीतिक तुष्टिकरण से, संतुष्टिकरण से, धार्मिकता ही नहीं मानवता भी कराह उठी है। भगवा से हिन्दू भावनाएं जुड़ी हैं। उनके संत पूज्यनीय हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कह कर उसे रंग देना क्या उचित है। राष्ट्रीय अस्मिता को बरकरार रखने वाले भगवाधारी देश ही नहीं विदेशों में भी मानवता का सन्देश दे रहे हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कहाँ पनप उठा।
भारत की एकता अखण्डता के सूत्र भगवा रंग -वस्त्र में अवगुन्थित राजनीति,सत्ता पर बरक़रार रहने के लिए देश की अस्मिता को ठेस पहुंचाना है, सामाजिकता नहीं है। आमजन की उदार सहिष्णुता कट्टरपंथ के मार्ग पर चल पड़े तो क्या होगा?
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के २०/०९ /१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )
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