रविवार, 24 अक्टूबर 2010

बलि प्रथा के विरोधी कौन ?

चंद्रपुर चंद्रहासिनी देवी के समक्ष बलि दिए जाने का पुरजोर विरोध फिर हुआ। बरसों से चली आ रही बलि प्रथा की खिलाफत कुछ वर्षों से होने लगी है। नवरात्री में देवी के समक्ष पशु बलि धार्मिक परंपरा और आस्था से जुडी है। आधुनिक चश्में से देखने वाले इसे अन्धविश्वास मानें, मगर वे कौन होते हैं किसी धर्म विशेष की परंपरा को ख़त्म करने वाले? बलि प्रथा विरोधी न तो अहिंसक हैं और न ही जीवों पर दया करने वाले लगते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यता,परम्परा और उनकी आस्था पर जब तब प्रहार किया जाता रहा है और यह सिलसिला जारी है। देवी के समक्ष बलि का विधान धार्मिक कर्मकांड से जुड़ा है। मनौती मानने वाले बलि देते हैं जो उनके धार्मिक विश्वास से जुड़ा है। चंद्रपुर में बलि प्रथा विरोधी स्वरों के खिलाफ दिलीप सिंह जूदेव ऐसी ही धार्मिक आस्था के साथ उठ खड़े हुए हैं जो हिन्दुओं की अस्मिता, आस्था की रक्षा है।
बलि प्रथा को अंधविश्वास,कुरीतियों का नाम देने वाले कौन हैं? अगर बलि प्रथा अंध परम्परा है तो बकरीद में कुर्बानी के बारे में ऐसे लोगों की क्या राय है?बलि प्रथा विरोधी जीव प्रेमी हैं तो देश में चल रहे मांसाहार को बंद करवाना चाहिए। हर गाँव-शहरों के कत्लगाह में रोज हजारों जानवर काटे जाते हैं। भारत में कई कत्लगाह हैं जहाँ प्रतिदिन हजारों निरीह पशुओं का वध किया जाता है। मांस, चमड़े का एक बड़ा बाजार कत्लखानों से जुड़ा है। मगर बलि प्रथा की मान्यताएं, विश्वास लोगों की भावनाओं से आबद्ध है। केवल हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ आन्दोलन, विरोधी स्वर गूंजते हैं। क्या यह हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं है?
विश्व की हर धार्मिक परम्पराओं में ऐसे कई कर्मकांड हैं जो 21वीं सदी में ओचित्यहीन लगते हैं। मगर क्या वहाँ इस तरह का पुरजोर विरोध करने का कोई साहस कर सकता है? भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है जहाँ उनकी धार्मिक अस्मिता के खिलाफ जब-तब विरोधी स्वर उठते हैं। ऐसे लोग अपना विरोध जाहिर कर समाज में क्या दिखाना चाहते हैं यह समझ से परे है। मगर एक बात साफ है कि वे अपनी खिलाफत से हिन्दुओं की मान्यताओं, परम्पराओं को खत्म करना चाहते हैं। हिन्दुओं को सनातन धर्मी कहा जाता है क्योंकि वे प्रकृति से जुड़े हैं। अधिसंख्य हिन्दू शाकाहारी हैं। जिनके कुछ पर्वों में बलि प्रथा का विधान सदियों से चला आ रहा है।
बलि प्रथा विरोधियों को अपना दृष्टिकोण समाज के समक्ष रखना चाहिए। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे केवल हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं, आस्था पर प्रहार करना चाहते हैं या फिर जीव प्रेमी हैं जो हर निर्दोष पशु को बचाना चाहते हैं। ऐसे तथाकथित समाज सेवक अपने ही आईने के सामने शर्मसार होंगे। अगर वे शर्मसार नहीं होना चाहते हैं तो बकरीद की कुर्बानी की खिलाफत क्यों नहीं करते ? देश में कत्ल खानों को बंद क्यों नहीं करवाते जहाँ पशु वध रोज होता है। समाज में फ़ैली कुरीतियों, अंधविश्वास को दूर करने वाले खुद ही दागदार हों तो क्या होगा? बलि प्रथा धार्मिक विश्वास से जुडी है, उन आस्थाओं पर प्रहार करना उस धर्म की खिलाफत करना है,उनकी परम्परा, संस्कृति को बिगाड़ना है। जो कतई उचित नहीं है।
(मेरे अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २० अक्टूबर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)

3 टिप्‍पणियां:

  1. 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ' यानी कि असत्य की ओर नहीं सत्‍य की ओर, अंधकार नहीं प्रकाश की ओर, मृत्यु नहीं अमृतत्व की ओर बढ़ो ।

    दीप-पर्व की आपको ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं ! आपका - अशोक बजाज रायपुर

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  2. बदलते परिवेश मैं,
    निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
    कोई तो है जो हमें जीवित रखे है ,
    जूझने के लिए प्रेरित किये है,
    उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
    हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
    यही शुभकामना!!
    दीप उत्सव की बधाई...........

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  3. यह तो सत्य है की बलि प्रथा धार्मिक विश्वास से जुडी है

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