बुधवार, 23 मार्च 2011

घोटालों,भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करना होगा

अगर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका नहीं लगाई जाती तो 2 जी स्पेक्ट्रम का घोटाला उजागर नहीं होता। उत्तरप्रदेश में 2001 से गरीबों के अनाज को सत्ता के दलालों, भ्रष्ट अधिकारियों ने विदेशों में बेच दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की वह गौर करने लायक है। यह मामला भी एक जनहित याचिका के कारण सामने आया। ऐसे कई मामले हैं जो प्रजातंत्र को खोखला करते हैं सामने नहीं आ सके तो उस पर जाँच और कार्यवाही होना तो दूर की बात है।
संसद का शीतकालीन अधिवेशन भ्रष्टाचार के खिलाफ जाँच की मांग पर भेंट चढ़ गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चुप्पी ही साध ली। अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो जाँच के लिए सरकार तैयार क्यूँ नहीं होती। दरअसल राजनीति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि उसे सत्य को तनिक भी स्वीकार करने का साहस नहीं है। जहाँ ईमान दम तोड़ चुका है। शर्म हया तक को ताक में रख दिया गया। जहाँ इंसान के नाम पर खून चूसने वाले भयावह चेहरे ही हैं। इनकी असलियत बाहर न आये इसका ही इन्हें भय है। भ्रष्टाचार की दलदल में पनपने वाली राजनीति के कद्दावर चेहरे मानवता के प्रबल शत्रु बन चुके हैं। प्रजातांत्रिक देश के लिए इससे ज्यादा शर्मसार बात क्या होगी? जिन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना वे ही जनता के खून पसीने की कमाई से अपने एशो आराम के साधन जुटा रहे हैं। सार्वजनिक तौर पर अपने आप को हरिश्चन्द्र की प्रतिमूर्ति बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहें हैं।
आम जनता महंगाई के बोझ तले नारकीय जीवन जी रही है। भ्रष्टाचार के दलालों के कारण अपनी इज्जत भी खो रही है, जिसका सब कुछ छिना जा रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आम आदमी का हौसला बढ़ाया है वह काबिले तारीफ है। अगर अब भी जनता नहीं जागी तो उसके साथ और अधिक बुरा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने जिस गंभीरता के साथ 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में सरकार को आड़े हाथ लिया और जाँच के लिए मजबूर भी कर दिया। संचार मंत्री ए. राजा का मंत्री पद छिन गया। मगर राष्ट्र मंडल खेलों में भ्रष्टाचार का खिलाड़ी कलमाडी की चमड़ी क्यों बचाई जा रही है आखिर उसके खैरख्वाह कौन हैं , इसके लिए आम जनता को मांग करनी चाहिए।

चूहे चाहते हैं कि बिल्ली उन्हें पकड़ नहीं सके। मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे यह प्रश्न चूहों के लिए भले आज भी अनुत्तरित होगा पर भारत की आम जनता के हाथों में कई अधिकार हैं। सूचना का अधिकार और जनहित याचिकाओं के माध्यम से कोई भी आम आदमी देश के गद्दारों को बेनकाब कर सकता है। भारत की सारी जनता चूहा नहीं है मगर अधिकांश की सोच के कारण ही देश में भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और अधिकारियों का बोलबाला बढ़ रहा है। जनता केवल जनप्रतिनिधियों को चुन कर अपने भाग्य का फैसला करने वाली चाबी को उन्हें सौंप देना काफी नहीं है। आदमी को अपने दायरे में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ डट कर मुकाबला करना चाहिए। जो ऐसा करते हैं उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। नहीं तो आने वाले दिनों में भ्रष्ट परजीवी इतने विशाल हो जायेंगे कि उनके खिलाफ कोई हथियार कारगर नहीं हो सकेगा।

भ्रष्टाचार और घोटालों को दबाने के लिए कई राजनितिक चालें चली जाती हैं। अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है। आतंकवादी वारदातें बढ जाती हैं। जनता का ध्यान भटक जाये और मुद्दे की बात से वह भटक जाये ऐसा ही होता रहा है। अगर जनता ऐसी भ्रष्ट राजनीति कुचक्र को समझ ले तो बेहतर होगा। उसे भ्रष्टाचार घोटालों के खिलाफ कमर कसना होगा। घूस जो अब दस्तूर बन रही है वह हमारी अपनी कमजोरी है उसे दूर करने के लिए सभी को एक जुट होना होगा तभी उज्जवल भारत की वह तस्वीर उभरेगी जिसका सपना देश के शहीदों ने देखा था। आस्तीनों में पल रहे सापों को मारने के लिए खुद को पहल करनी होगी। ऐसा संकल्प देश के हर गाँव-कस्बों में थोड़े ही लोग लेलें तो देश की संसद का यह हश्र देखने को नहीं मिलेगा जो संसद के शीतकालीन सत्र में देखने को मिला। ( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के 20/12/2010 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

शोर में गुम होते घोटाले,भ्रष्टाचार

भड़काऊ बयान के शोर तले कई घोटाले दब जाते हैं। अधिकांश घोटाले जाँच प्रक्रिया के दायरे में नहीं आ पाते। जाँच होती है तो इतना लंबा समय लगता है कि,अपराधी को बच निकलने का समय मिल जाता है। महाराष्ट्र में आदर्श सोसायटी का मामला उजागर हुआ तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सर-संघ चालक सुदर्शन के बयान पर कांग्रेस ने पूरे देश में हंगामा मचाया, सुदर्शन के पुतले जले और शोर शराबे के बीच मामला ठंडा पड़ गया।
आदर्श सोसायटी में फ्लेट निर्माण कर कारगिल के शहीद परिवारों को बसाना था,जो नहीं हो सका। सारे नियम क़ानून को ठेंगा बताकर ३१ मंजिला इमारत खड़ी कर दी गयी। आदर्श सोसायटी में जन प्रतिनिधि बने नेता, बड़े पदों पर बैठे हमारे नौकरशाह और सेना के वरिष्टतम अधिकारियों ने आदर्श सोसायटी पर फ्लैट ले लिया। मुख्यमंत्री बदल गया पर नए मुख्यमंत्री में इतनी ताकत नहीं है कि राजनीतिक,नौकरशाहों और सेना अधिकारियों से फ्लैट वापस ले लें। कारगिल के शहीद परिवारों का हक़ छीनने पर कांग्रेस ने कोई बवाल नहीं मचाया। उन्हें तो सुदर्शन के बयान पर आन्दोलन करना जरुरी था।
भ्रष्टाचार और घोटाले की राजनीति में आम आदमी पिस रहा है। महंगाई की चक्की में पिसते आम जन को कोई राहत नहीं मिल रही है। राष्ट्र मंडल खेलों में करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ मगर अब तक कोई पकड़ में नहीं आ सका। ऐसा लगता है कि देश की क़ानून व्यवस्था आम आदमी के लिए ही बनी है जिसमें ज़रा सी गलती की और क़ानून के शिकंजे में वह आ गया। हमारी अदालतों में अधिकांश प्रकरण ऐसे ही हैं। बड़े घोटाले, भ्रष्टाचार करने वाले अपने पद, प्रभाव से सब कुछ निपटा लेते हैं। पूर्व पुलिस महानिरीक्षक राठोर पर १८ साल बाद क़ानून का फंदा पडा तो क्या हुआ? देश की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी सी.बी.आई. ने राठोर को क्लीनचिट दे दी। अब सी.बी.आई.के खिलाफ कौन बोलेगा, वह सर्वशक्तिमान जो ठहरी। सी बी आई की कार्यप्रणाली पर जब तब उंगली उठती रही है मगर अब तक उसका रवैया नहीं बदला। २ जी स्पैक्ट्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछताछ की है। केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार चुप्पी साधे बैठी है। घोटाला तो हुआ है पर इसका दोषी कौन है, हर बार की तरह जाँच आयोग बैठा दिया जाएगा और मामला ठंडा पड़ जाएगा।
नक्सलवाद समस्या देश के लिए नासूर बन गयी है। तथाकथित नक्सली अब माफिया गिरोह बन गया है जो भ्रष्टाचारियों से चौथ वसूली कर रहे हैं। नक्सली आम आदमी का जीना हराम कर रहे हैं। यात्री ट्रेनों में विस्फोट,विद्ध्युत आपूर्ती में बाधा और विकास के कार्यों पर रोक लगाना नक्सलियों का मुख्य कार्य बन गया है। मई २०१० में यात्री ट्रेन में विस्फोट के बाद रेलवे सरकार नक्सलियों के आगे नतमस्तक हो गयी है। पश्चिम बंगाल में यात्री ट्रेनें रात में चलना बंद हो गयी हैं। रेलवे का यह निर्णय नक्सलियों के वजूद को और बढ़ाना ही दिख पड़ता है। खैर बंगाल में चुनाव के बाद ही यह तय होगा कि किसमें है दम।
सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दांव पेंच और सत्ता में रह कर भ्रष्टाचार और घोटाले कर धन बटोरना आज मुख्य ध्येय बन गया है। हर जगह लूट का बोलबाला हो गया है। ऐसा कोई कानून नहीं दिख रहा है जो भ्रष्टाचार और घोटालों पर नकेल लगा सके। भड़काऊ बयान के बाद आन्दोलन से सार्वजनिक संपत्ति को जो नुकसान होता है उसकी भरपाई कौन करेगा? इन सबके लिए क़ानून बनाना अब जरूरी हो गया है।
( मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २०/११/२०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)

रविवार, 14 नवंबर 2010

मुन्नी नहीं छत्तीसगढ़ बदनाम हुआ

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के मंच से मुन्नी बदनाम हुई। दर्शकों पर पुलिस की लाठी बरसी। सारा नज़ारा कुछ अटपटा सा लगा। ऐसा लगा कि हम बिहार पहुँच गए जहां अक्सर ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है। सारा उत्सव सलमान खान के आने और जाने में ही सिमट गया। सरकारी मंच से आइटम सांग के ठुमके लगे जिसने भीड़ का सैलाब बहा दिया,मगर कुछ अच्छा नहीं लगा। न मालूम सरकार के किस नुमाइंदे का यह किया धरा है कि राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ बदनाम हुआ। सरकार को बदनाम करने की कोई साजिश है इस बात से इन्कार भी नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ निर्माण के दस साल में राज्य ने बेहतर प्रगति की है। रमन सिंह अपनी लोक कल्याणकारी योजनाओं को क्रियान्वित करते हुए देश के मुख्यमंत्रियों को सन्देश भी दे रहे हैं। देश में छत्तीसगढ़ की प्रगति अव्वल नंबर पर पहुंच गयी है। खुशहाल राज्य बनते छत्तीसगढ़ के जन-जन के चेहरे में रौनक झलकने लगी है। छत्तीसगढ़ अपनी उपलब्धियों के लिए एक मिसाल बन गया है। अफसोस है कि राज्योत्सव में एक मिसाल कायम होती जो नहीं हो सकी।
राज्योत्सव की परंपरा में स्थानीय सहित देश के चुनिन्दा व्यक्तित्व की शिरकत होती रही है। हर बार का उत्सव एक सन्देश देता है। छत्तीसगढ़ की लोक कला, परम्परा, उससे जुड़े लोगों को बड़ी आशा होती है कि उन्हें हर कोई देखे। इस बार ऐसा कुछ देखने का उत्साह ही काफूर हो गया क्योंकि उन पर पुलिस का डंडा कहर बरपा गया।
सरकार का मंच किसी कम्पनी के रहमोकरम का मोहताज नहीं है, खासकर छत्तीसगढ़ जैसा समृद्ध राज्य तो हो ही नहीं सकता। सलमान खान और टीवी कंपनी का नाम हर आदमी की जुबान पर चढ़ गया। अफवाहों के पंख पांव पसारते हैं, जहाँ राज्योत्सव का खर्चा टी वी कंपनी अपने जिम्मे ले रही है। ऐसी आम चर्चा का बाजार गर्म है।
छत्तीसगढ़ की जनता में सरकार की छबि और उनकी सोच में एक दुहराव सा आ गया है। राज्योत्सव की शुरुआत ने भीड़ तो बटोर ली पर उनके दिलों पर चोट भी कर दी। सलमान खान और आइटम गर्ल को हर कोई देखना पसंद करता है,पर राज्य के मंच में उनके सम्मान के लिए पलक-पांवड़े बिछा देना,कुछ अच्छा नहीं लगा।
राज्य बनने के एक दशक होने पर कोई यादगार प्रस्तुति होती,सरकार आम आदमी को उत्सव संस्कृति से जोडती, जो नहीं हो सका। फ़िल्मी कलाकार समाज से अलग नहीं हैं पर उन कलाकारों को मंच देना जो फूहड़ अश्लीलता परोसते हैं, उचित नहीं है। सलमान खान जिनके ऊपर कृष्ण मृग को मारने का
आरोप राजस्थान में लगा और दूसरे प्रकरण भी हैं। सामाजिक मर्यादा का पालन नहीं करने वाले कलाकार को छत्तीसगढ़ में अभिनंदित करना गरिमा के अनुकूल नहीं है।
राज्योत्सव में जो हो गया वह नहीं होना था। राज्योत्सव से जो आशा लगी थी वह धूमिल पड़ गयी। राज्य की एक अच्छी सरकार जो अपनी कल्याणकारी योजनाओं को मूर्त रूप दे रही है वह ऐसा कुछ करे कि उसके खिलाफ बोलने के लिए मन मजबूर हो जाये, इसके लिए किसे दोष दिया जाए यह ठीक-ठीक समझ नहीं आता। बहरहाल बदनामी का ठीकरा तो छत्तीसगढ़ में फूट ही गया। राज्योत्सव की नाकामयाबी को ढकने के लिए सरकार को पहल करनी होगी। मुख्यमंत्री रमन सिंह को एक पहल करनी होगी ताकि उनके बढ़ते कदम में वही गति और लय रहे जो अब तक विद्यमान है।
(मेरे पाक्षिक अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के ५ नवम्बर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

बलि प्रथा के विरोधी कौन ?

चंद्रपुर चंद्रहासिनी देवी के समक्ष बलि दिए जाने का पुरजोर विरोध फिर हुआ। बरसों से चली आ रही बलि प्रथा की खिलाफत कुछ वर्षों से होने लगी है। नवरात्री में देवी के समक्ष पशु बलि धार्मिक परंपरा और आस्था से जुडी है। आधुनिक चश्में से देखने वाले इसे अन्धविश्वास मानें, मगर वे कौन होते हैं किसी धर्म विशेष की परंपरा को ख़त्म करने वाले? बलि प्रथा विरोधी न तो अहिंसक हैं और न ही जीवों पर दया करने वाले लगते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यता,परम्परा और उनकी आस्था पर जब तब प्रहार किया जाता रहा है और यह सिलसिला जारी है। देवी के समक्ष बलि का विधान धार्मिक कर्मकांड से जुड़ा है। मनौती मानने वाले बलि देते हैं जो उनके धार्मिक विश्वास से जुड़ा है। चंद्रपुर में बलि प्रथा विरोधी स्वरों के खिलाफ दिलीप सिंह जूदेव ऐसी ही धार्मिक आस्था के साथ उठ खड़े हुए हैं जो हिन्दुओं की अस्मिता, आस्था की रक्षा है।
बलि प्रथा को अंधविश्वास,कुरीतियों का नाम देने वाले कौन हैं? अगर बलि प्रथा अंध परम्परा है तो बकरीद में कुर्बानी के बारे में ऐसे लोगों की क्या राय है?बलि प्रथा विरोधी जीव प्रेमी हैं तो देश में चल रहे मांसाहार को बंद करवाना चाहिए। हर गाँव-शहरों के कत्लगाह में रोज हजारों जानवर काटे जाते हैं। भारत में कई कत्लगाह हैं जहाँ प्रतिदिन हजारों निरीह पशुओं का वध किया जाता है। मांस, चमड़े का एक बड़ा बाजार कत्लखानों से जुड़ा है। मगर बलि प्रथा की मान्यताएं, विश्वास लोगों की भावनाओं से आबद्ध है। केवल हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ आन्दोलन, विरोधी स्वर गूंजते हैं। क्या यह हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं है?
विश्व की हर धार्मिक परम्पराओं में ऐसे कई कर्मकांड हैं जो 21वीं सदी में ओचित्यहीन लगते हैं। मगर क्या वहाँ इस तरह का पुरजोर विरोध करने का कोई साहस कर सकता है? भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है जहाँ उनकी धार्मिक अस्मिता के खिलाफ जब-तब विरोधी स्वर उठते हैं। ऐसे लोग अपना विरोध जाहिर कर समाज में क्या दिखाना चाहते हैं यह समझ से परे है। मगर एक बात साफ है कि वे अपनी खिलाफत से हिन्दुओं की मान्यताओं, परम्पराओं को खत्म करना चाहते हैं। हिन्दुओं को सनातन धर्मी कहा जाता है क्योंकि वे प्रकृति से जुड़े हैं। अधिसंख्य हिन्दू शाकाहारी हैं। जिनके कुछ पर्वों में बलि प्रथा का विधान सदियों से चला आ रहा है।
बलि प्रथा विरोधियों को अपना दृष्टिकोण समाज के समक्ष रखना चाहिए। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे केवल हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं, आस्था पर प्रहार करना चाहते हैं या फिर जीव प्रेमी हैं जो हर निर्दोष पशु को बचाना चाहते हैं। ऐसे तथाकथित समाज सेवक अपने ही आईने के सामने शर्मसार होंगे। अगर वे शर्मसार नहीं होना चाहते हैं तो बकरीद की कुर्बानी की खिलाफत क्यों नहीं करते ? देश में कत्ल खानों को बंद क्यों नहीं करवाते जहाँ पशु वध रोज होता है। समाज में फ़ैली कुरीतियों, अंधविश्वास को दूर करने वाले खुद ही दागदार हों तो क्या होगा? बलि प्रथा धार्मिक विश्वास से जुडी है, उन आस्थाओं पर प्रहार करना उस धर्म की खिलाफत करना है,उनकी परम्परा, संस्कृति को बिगाड़ना है। जो कतई उचित नहीं है।
(मेरे अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २० अक्टूबर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

जय अग्रोहा-जय अग्रसेन

अग्रोहा गणराज्य के संस्थापक महाराजा अग्रसेन की गौरव गाथा आज भी कही जाती है। पाँच हजार वर्ष पूर्व एक ऐसा राजा हुआ जिसके राज्य में लोकतंत्र था। दुनिया में असंख्य राजा हुए उनमें महाराजा अग्रसेन ने जो मिसाल कायम की जिससे उनकी कीर्ती पताका समूचे विश्व में फहरा रही है। अग्रसेन जी के राज्य में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली थी। अहिंसा,समर्पण,राष्ट्र प्रेम के साथ अग्रोहा में समाजवाद था। जहाँ हर धर्म,जाति का सम्मान था। अमीरी-गरीबी की विषमता जहाँ नहीं दिखती थी वहाँ के नागरिक व्यापार,कृषि,गोपालन के साथ वीर सिपाही भी थे। आपसी भाईचारा, प्रेम, सदभाव के साथ हर नागरिक देशभक्त था। यह केवल इसलिए कि राजा अग्रसेन ने अपने हर नागरिकों के उत्थान के लिए ऐसी व्यवस्था कायम की थी जिसमें वैभवशाली सुख-शांति विराजमान थी।
अग्रोहा में बसने वालों के हर घर से एक ईंट एक रूपया मिलता था। जहाँ एक लाख परिवार रहते थे। घर और काम शुरू करने के लिए धन की व्यवस्था नागरिक करते थे,क्योंकि यह राजा का आदेश था। अग्रोहा की शासन व्यवस्था,खुशहाली को देखकर अनेक लोग यहाँ बसते गए। राज्य के हर नागरिक के लिए एक ही नियम था,जो एक-दूसरे के हित के लिए तत्पर रहते थे।
महाराजा अग्रसेन ने केवल राज्य ही नहीं किया बल्कि सिद्धांतों को प्रतिस्थापित भी किया। अपने गणराज्य के नागरिकों में दान,धर्म और लोकोपकारिता के लिए प्रेरित किया। अपार शक्ति, वैभव को जनहितार्थ के लिए लगाया। जिन्होंने अपना राज्य अट्ठारह गणों में बांटा और अग्रोहा को राजधानी घोषित किया। महाराजा अग्रसेन के अट्ठारह पुत्र हुए। हर पुत्रों को अलग-अलग गुरुओं से शिक्षा दिलाई। उन्हीं गुरुओं के नाम से अट्ठारह गोत्र बने। अग्रवालों में अट्ठारह गोत्र आज भी हैं।
अग्रवाल जो आज भी दान-धर्म समाज सेवा में सबसे आगे हैं। समाज प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन के पद चिन्हों पर चलकर अग्रवालों ने दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। राष्ट्र सेवा के साथ आपसी भाई चारा की भावना,हर धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा जताने वाले अग्रवाल,जहाँ भी हैं वहाँ पथिकों के लिए धर्मशाला जरुर बनी है। अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्द अग्रवाल शिक्षा संस्थान, पेयजल, अस्पतालों, गोशालाओं के साथ नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं को मुहैया करवाने में आज भी आगे हैं।
आश्विन शुक्ल पक्ष की एकम को महाराजा अग्रसेन जन्में थे। हर वर्ष उनकी जयन्ती मनाकर उनके सिद्धांतों आदर्शों को याद किया जाता है। महाराजा अग्रसेन ने अपने नागरिकों को एवं समाज को जो पथ दिखलाया था उसका ही प्रताप आज अग्रवालों के लिए वरदानी सिद्ध हुआ है। भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश में देशभक्ति,समता, परोपकार की बयार चले तथा हम महाराजा अग्रसेन जी के चरित्र को अपने जीवन में आत्मसात करें,ताकि देश और समाज के लिए हम एक मिसाल बन सके। यही आज के लिए बड़ी जरुरत है। महापुरुषों को याद कर अपने जीवन को सफल ऐसे ही बनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन देश,समाज, नागरिकों की समृद्धि, प्रगति के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे। जिनके सिद्धांतों की ज्योति तले सभी का मार्ग आलोकित हो ऐसी कामना है।

(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के 05/10 /10 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

क्या आतंकवाद रंगीन होता है?

वैराग्य,सन्यास,के भगवा रंग को राजनीति के चलते आतंकी करार दे दिया।देश की युवा पीढ़ी "भगवा आतंकवाद" का शिकार हो रही है। गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने देश के पुलिस प्रमुखों की बैठक में आतंकवाद को एक रंग दे दिया। विडम्बना पूर्ण गृहमंत्री का ऐसा बयान भावनाओं को आहत करने वाला है जो भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर भी एक मर्मान्तक प्रहार है।
संतों का भगवा वस्त्र आजादी के दीवानों का पर्याय भी बना।बंकिमचंद्र चटर्जी ने भगवा ध्वज तले वन्दे मातरम काअलख जगा आजादी के दीवानों को एक दिशा प्रदान की थी। जहाँ से राष्ट्र के लिए बलिदान की शुरुआत हुई। भगवा रंग आजादी बलिदानी और शुचिता का प्रतीक है। राष्ट्रीय ध्वज में यही भगवा
रंग केशरिया बाना बना है।
गृहमंत्री भगवा आतंकवाद कहकर क्या रंग दे रहे हैं। गृहमंत्री नासमझी में ऐसे वक्तव्य नहीं दे सकते। आखिर वे कौन से तथ्य हैं जहाँ से भगवा आतंकवाद के रूप में उपजा। गृहमंत्री को स्पष्ट कर देना चाहिए।
आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता उसमें केवल हिंसा का क्रूर, तांडव होता है, जहाँ मानवता कराहती है,इंसानियत मरती है तब जीवन नहीं दरिन्दगी का सैलाब उमड़ पड़ता है। आतंक समूची प्रकृति, समाज, परिवार को खत्म करता है। आतंकी, इंसानी मुखौटा लगाये धरती, अपनी माँ की कोख तक को कलंकित करते हैं। इनका कोई रंग नहीं, धर्म नहीं और इंसानियत से कोई वास्ता नहीं होता।
भगवा वस्त्रों को संतों ने इसलिए धारण किया क्योंकि भगवा शरीर की दूषित भावनाओं को ख़त्म करता है,फिर यह भगवा रंग आतंकवाद का पर्याय कैसे हो सकता है। जीवन से विरक्त होकर सन्यासी बनने वालों ने भगवा बाना को अपनाया। दसवीं सदी में हिन्दुस्थान को एक सूत्र में बांधने वाले शंकराचार्य भगवाधारी थे। जिन्होंने देश की विभिन्न जाति-धर्म की एकता के लिए चार तीर्थों की स्थापना की थी। केदारनाथ,द्वारिका,रामेश्वरम और पुरी में शंकराचार्य की पीठ की महान परंपरा आज भी चल रही है। सिक्खों की बलिदानी परंपरा से हर गुरूद्वारे में भगवा ध्वज आज भी लहराता है।
विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भगवा धारण कर भारतीय संस्कृति को महिमा मंडित किया था। विश्व के महान ओरेटर आचार्य रजनीश ने भगवा धारण कर अमेरिका तक में तहलका मचाया था। हमारे साधू संत भगवा धारण करते हैं जो उन्हें आम आदमी से अलग एक पहचान देता है। भगवाधारी समाज को शुचिता का सन्देश देते हैं और समाज उन्हें आदर सम्मान देता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भगवा ध्वज आन-बान-शान का प्रतीक है। संघ अपने ध्वज तले समाज सेवा का कार्य अहर्निश करता चला आ रहा है। छत्रपति शिवाजी जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी। जिन्होंने अपना पूरा राज- पाट अपने गुरु रामदास जी को सौंप दिया था। रामदास जी ने फिर से शिवाजी को राज्य का अधिकारी बनाया और उन्हें अपना वस्त्र दिया जो शिवाजी के राज्य का भगवा ध्वज बना। शिवाजी की प्रेरणा मानकर डा.हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। संघ का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का रहा है जो आज भी उस पर अडिग है। राजनीतिक तुष्टिकरण से, संतुष्टिकरण से, धार्मिकता ही नहीं मानवता भी कराह उठी है। भगवा से हिन्दू भावनाएं जुड़ी हैं। उनके संत पूज्यनीय हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कह कर उसे रंग देना क्या उचित है। राष्ट्रीय अस्मिता को बरकरार रखने वाले भगवाधारी देश ही नहीं विदेशों में भी मानवता का सन्देश दे रहे हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कहाँ पनप उठा।
भारत की एकता अखण्डता के सूत्र भगवा रंग -वस्त्र में अवगुन्थित राजनीति,सत्ता पर बरक़रार रहने के लिए देश की अस्मिता को ठेस पहुंचाना है, सामाजिकता नहीं है। आमजन की उदार सहिष्णुता कट्टरपंथ के मार्ग पर चल पड़े तो क्या होगा?
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के २०/०९ /१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )

शनिवार, 28 अगस्त 2010

कुछ तो शर्म करो...

ब्लागर जगत के मित्रों की शिकायत हो सकती है कि कई दिनों से अपने ब्लॉग में कुछ लिख क्यों नहीं रहा हूँ. कुछ व्यक्तिगत कारणों से व्यस्तता के चलते लिख नहीं पाया इसलिए मेरे बुद्धिजीवी मित्रों का मै क्षमाप्रार्थी हूँ. परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे मन के गुबार मिट गए हैं. इस बीच विश्व के सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश में जो शर्मनाक घटना घटी और उसकी कोई आक्रोशित प्रतिक्रिया भारत की जनता ने प्रगट नहीं की उससे मन व्यथित हो गया और अपनी व्यथा आप लोगों के समक्ष व्यक्त क़र रहा हूँ इस उम्मीद के साथ शायद कोई जयप्रकाश, दीनदयाल,लोहिया के इस देश की चिंता करेगा और सोचेगा अपने स्वार्थ से राष्ट्र हित बड़ा होता है हम मिटते हैं तो राष्ट्र खड़ा होता है:-
देश का अनाज भले ही सड़ जाये मगर उसे गरीब जनता में नहीं बांटा जा सकता. देश की सरकार का यह मानना है. भारत के 30 करोड़ लोग गरीबी,भूख,कुपोषण से बेहाल हैं.इस फटेहाल देश के 787 सांसदों ने अपनी तकदीर खुद लिख ली. सांसदों ने एक झटके में अपना वेतन तीन गुना बढ़ा लिया. यह कोई मजदूर नहीं हैं जिन्हें अपनी मजदूरी बढ़ाने के लिए जुलुस निकालना पड़ता है या कोई आन्दोलन करके लाठी और गोली खाना पड़ता है. ये हमारे देश के चुनिन्दा जन प्रतिनिधि हैं जिन्हें सौ करोड़ से अधिक लोगों ने सरकार बनाने के लिए चुना है.
16 हजार रूपये पाने वाले सांसदों का वेतन 50 हजार रुपया हो गया इस पर हमारे माननीय सांसदों को संतोष नहीं हुआ.संसद भवन में एक नई नौटंकी हुई.संसद को भंग क़र एक नई सरकार बना डाली जिसके संयुक्त प्रधानमंत्री लालूप्रसाद यादव और मुलायमसिंह बने. लोकसभा अध्यक्ष भाजपा के गोपीनाथ मुंडे को बनाया गया. यह नाटक नौटंकी महज इसलिए कि,तिगुनी वेतन वृद्धि भी हमारे सांसदों का पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं है. आखिरकार सांसदों की अनेक सुख सुविधाओं और भत्ते में बढोतरी की गई.
भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी ने सांसदों के ऐसे रवैये पर विरोध जाहिर किया, मगर सांसदों के नक्कार खाने में आडवाणी की तूती फीकी पड़ गयी. हमारे जन प्रतिनिधि ही ऐसे हैं जो अपनी तनख्वाह,भत्ता,सुविधा खुद तय क़र लेते हैं आखिर वे सरकार जो ठहरे. ऐसा करते वे तनिक भी शर्मिंदा नहीं होते बल्कि देश की जनता का सिर शर्म से झुक जाता है जिन्होंने खुद उनको चुन क़र भेजा है.
सांसदों ने जनता के लिए नहीं बल्कि अपनी खिचड़ी खुद पकाई और भरपूर घी भी डाल लिया.50 हजार रुपया महीना वेतन के अलावा सांसद कार्यालय की खर्च सीमा 20 हजार रूपए से दूना क़र 40 हजार हो गयी.निर्वाचन क्षेत्र के भत्ते को 20 हजार से बढाकर 40 हजार रूपये क़र दिया.निजी वाहन खरीदने के लिए 1 लाख रूपये ब्याज मुक्त ऋण बढकर 4 लाख हो गया. सांसदों द्वारा उपयोग में आने वाले वाहनों की रोड माइलेज 13 रूपये से बढकर 16 रूपये प्रति किलोमीटर क़र दी गई. पेंशन लाभ 8 हजार रूपये से बढकर 20 हजार हो गई.साल भर में सांसद को 1 लाख 50 हजार मुफ्त फोन काल की सुविधा के साथ तीन लैंड लाइन और 2 मोबाईल मुफ्त मिलेंगे. मुफ्त आवास की सुविधा के साथ सरकार 60 हजार का फर्नीचर भी देगी. साल भर में 50 हजार यूनिट बिजली भी मुफ्त.
लोकसभा, राज्यसभा के सांसदों के केवल वेतन पर साल भर में 13 करोड़ 76 लाख खर्च होते हैं और अब 62 करोड़ 50 लाख 75 हजार 796 रूपये का भार संसदीय बजट पर पड़ेगा. सचिवों से एक रुपया अधिक वेतन की मांग करने वाले सांसदों को यह गुमान नहीं है कि वे जनता के चुने हुए जन प्रतिनिधि हैं. वेतन भोगी कर्मचारी नहीं. जनता ने उन्हें जन सेवा के लिए भेजा और उन्होंने जन सेवा के नाम पर घर घर जाकर वोट माँगा है.
देश की लोकसभा और राज्यसभा में 787 सांसदों पर 172 करोड़ रुपया का खर्च आता है जहाँ हमारे सांसद उंघते हैं, कोई चिल्लाता है,कोई लड़ता है मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी एक मत नहीं होते. मगर अपने स्वार्थ के लिए सभी एक स्वर में चिल्ला रहे थे और फिर भी संतुष्ट नहीं हुए. ऐसे में भला देश की गरिमा,अस्मिता की बागडोर थामने वाले हमारे सांसद किसका भला करेंगे. ऐसे में कवि धूमिल की पंक्तियाँ याद आती हैं जिन्होंने लिखा है-
एक आदमी रोटी बेलता है
दूसरा आदमी रोटी सेंकता है
तीसरा आदमी रोटी से खेलता है
यह तीसरा आदमी कौन
मेरे देश की संसद मौन