रविवार, 24 अक्टूबर 2010
बलि प्रथा के विरोधी कौन ?
बलि प्रथा को अंधविश्वास,कुरीतियों का नाम देने वाले कौन हैं? अगर बलि प्रथा अंध परम्परा है तो बकरीद में कुर्बानी के बारे में ऐसे लोगों की क्या राय है?बलि प्रथा विरोधी जीव प्रेमी हैं तो देश में चल रहे मांसाहार को बंद करवाना चाहिए। हर गाँव-शहरों के कत्लगाह में रोज हजारों जानवर काटे जाते हैं। भारत में कई कत्लगाह हैं जहाँ प्रतिदिन हजारों निरीह पशुओं का वध किया जाता है। मांस, चमड़े का एक बड़ा बाजार कत्लखानों से जुड़ा है। मगर बलि प्रथा की मान्यताएं, विश्वास लोगों की भावनाओं से आबद्ध है। केवल हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ आन्दोलन, विरोधी स्वर गूंजते हैं। क्या यह हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं है?
विश्व की हर धार्मिक परम्पराओं में ऐसे कई कर्मकांड हैं जो 21वीं सदी में ओचित्यहीन लगते हैं। मगर क्या वहाँ इस तरह का पुरजोर विरोध करने का कोई साहस कर सकता है? भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है जहाँ उनकी धार्मिक अस्मिता के खिलाफ जब-तब विरोधी स्वर उठते हैं। ऐसे लोग अपना विरोध जाहिर कर समाज में क्या दिखाना चाहते हैं यह समझ से परे है। मगर एक बात साफ है कि वे अपनी खिलाफत से हिन्दुओं की मान्यताओं, परम्पराओं को खत्म करना चाहते हैं। हिन्दुओं को सनातन धर्मी कहा जाता है क्योंकि वे प्रकृति से जुड़े हैं। अधिसंख्य हिन्दू शाकाहारी हैं। जिनके कुछ पर्वों में बलि प्रथा का विधान सदियों से चला आ रहा है।
बलि प्रथा विरोधियों को अपना दृष्टिकोण समाज के समक्ष रखना चाहिए। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे केवल हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं, आस्था पर प्रहार करना चाहते हैं या फिर जीव प्रेमी हैं जो हर निर्दोष पशु को बचाना चाहते हैं। ऐसे तथाकथित समाज सेवक अपने ही आईने के सामने शर्मसार होंगे। अगर वे शर्मसार नहीं होना चाहते हैं तो बकरीद की कुर्बानी की खिलाफत क्यों नहीं करते ? देश में कत्ल खानों को बंद क्यों नहीं करवाते जहाँ पशु वध रोज होता है। समाज में फ़ैली कुरीतियों, अंधविश्वास को दूर करने वाले खुद ही दागदार हों तो क्या होगा? बलि प्रथा धार्मिक विश्वास से जुडी है, उन आस्थाओं पर प्रहार करना उस धर्म की खिलाफत करना है,उनकी परम्परा, संस्कृति को बिगाड़ना है। जो कतई उचित नहीं है।
(मेरे अखबार "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के २० अक्टूबर २०१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय)
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
जय अग्रोहा-जय अग्रसेन
अग्रोहा में बसने वालों के हर घर से एक ईंट एक रूपया मिलता था। जहाँ एक लाख परिवार रहते थे। घर और काम शुरू करने के लिए धन की व्यवस्था नागरिक करते थे,क्योंकि यह राजा का आदेश था। अग्रोहा की शासन व्यवस्था,खुशहाली को देखकर अनेक लोग यहाँ बसते गए। राज्य के हर नागरिक के लिए एक ही नियम था,जो एक-दूसरे के हित के लिए तत्पर रहते थे।
महाराजा अग्रसेन ने केवल राज्य ही नहीं किया बल्कि सिद्धांतों को प्रतिस्थापित भी किया। अपने गणराज्य के नागरिकों में दान,धर्म और लोकोपकारिता के लिए प्रेरित किया। अपार शक्ति, वैभव को जनहितार्थ के लिए लगाया। जिन्होंने अपना राज्य अट्ठारह गणों में बांटा और अग्रोहा को राजधानी घोषित किया। महाराजा अग्रसेन के अट्ठारह पुत्र हुए। हर पुत्रों को अलग-अलग गुरुओं से शिक्षा दिलाई। उन्हीं गुरुओं के नाम से अट्ठारह गोत्र बने। अग्रवालों में अट्ठारह गोत्र आज भी हैं।
अग्रवाल जो आज भी दान-धर्म समाज सेवा में सबसे आगे हैं। समाज प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन के पद चिन्हों पर चलकर अग्रवालों ने दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। राष्ट्र सेवा के साथ आपसी भाई चारा की भावना,हर धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा जताने वाले अग्रवाल,जहाँ भी हैं वहाँ पथिकों के लिए धर्मशाला जरुर बनी है। अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्द अग्रवाल शिक्षा संस्थान, पेयजल, अस्पतालों, गोशालाओं के साथ नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं को मुहैया करवाने में आज भी आगे हैं।
आश्विन शुक्ल पक्ष की एकम को महाराजा अग्रसेन जन्में थे। हर वर्ष उनकी जयन्ती मनाकर उनके सिद्धांतों आदर्शों को याद किया जाता है। महाराजा अग्रसेन ने अपने नागरिकों को एवं समाज को जो पथ दिखलाया था उसका ही प्रताप आज अग्रवालों के लिए वरदानी सिद्ध हुआ है। भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश में देशभक्ति,समता, परोपकार की बयार चले तथा हम महाराजा अग्रसेन जी के चरित्र को अपने जीवन में आत्मसात करें,ताकि देश और समाज के लिए हम एक मिसाल बन सके। यही आज के लिए बड़ी जरुरत है। महापुरुषों को याद कर अपने जीवन को सफल ऐसे ही बनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन देश,समाज, नागरिकों की समृद्धि, प्रगति के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे। जिनके सिद्धांतों की ज्योति तले सभी का मार्ग आलोकित हो ऐसी कामना है।
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के 05/10 /10 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
क्या आतंकवाद रंगीन होता है?
संतों का भगवा वस्त्र आजादी के दीवानों का पर्याय भी बना।बंकिमचंद्र चटर्जी ने भगवा ध्वज तले वन्दे मातरम काअलख जगा आजादी के दीवानों को एक दिशा प्रदान की थी। जहाँ से राष्ट्र के लिए बलिदान की शुरुआत हुई। भगवा रंग आजादी बलिदानी और शुचिता का प्रतीक है। राष्ट्रीय ध्वज में यही भगवा
रंग केशरिया बाना बना है।
गृहमंत्री भगवा आतंकवाद कहकर क्या रंग दे रहे हैं। गृहमंत्री नासमझी में ऐसे वक्तव्य नहीं दे सकते। आखिर वे कौन से तथ्य हैं जहाँ से भगवा आतंकवाद के रूप में उपजा। गृहमंत्री को स्पष्ट कर देना चाहिए।
आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता उसमें केवल हिंसा का क्रूर, तांडव होता है, जहाँ मानवता कराहती है,इंसानियत मरती है तब जीवन नहीं दरिन्दगी का सैलाब उमड़ पड़ता है। आतंक समूची प्रकृति, समाज, परिवार को खत्म करता है। आतंकी, इंसानी मुखौटा लगाये धरती, अपनी माँ की कोख तक को कलंकित करते हैं। इनका कोई रंग नहीं, धर्म नहीं और इंसानियत से कोई वास्ता नहीं होता।
भगवा वस्त्रों को संतों ने इसलिए धारण किया क्योंकि भगवा शरीर की दूषित भावनाओं को ख़त्म करता है,फिर यह भगवा रंग आतंकवाद का पर्याय कैसे हो सकता है। जीवन से विरक्त होकर सन्यासी बनने वालों ने भगवा बाना को अपनाया। दसवीं सदी में हिन्दुस्थान को एक सूत्र में बांधने वाले शंकराचार्य भगवाधारी थे। जिन्होंने देश की विभिन्न जाति-धर्म की एकता के लिए चार तीर्थों की स्थापना की थी। केदारनाथ,द्वारिका,रामेश्वरम और पुरी में शंकराचार्य की पीठ की महान परंपरा आज भी चल रही है। सिक्खों की बलिदानी परंपरा से हर गुरूद्वारे में भगवा ध्वज आज भी लहराता है।
विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भगवा धारण कर भारतीय संस्कृति को महिमा मंडित किया था। विश्व के महान ओरेटर आचार्य रजनीश ने भगवा धारण कर अमेरिका तक में तहलका मचाया था। हमारे साधू संत भगवा धारण करते हैं जो उन्हें आम आदमी से अलग एक पहचान देता है। भगवाधारी समाज को शुचिता का सन्देश देते हैं और समाज उन्हें आदर सम्मान देता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भगवा ध्वज आन-बान-शान का प्रतीक है। संघ अपने ध्वज तले समाज सेवा का कार्य अहर्निश करता चला आ रहा है। छत्रपति शिवाजी जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी। जिन्होंने अपना पूरा राज- पाट अपने गुरु रामदास जी को सौंप दिया था। रामदास जी ने फिर से शिवाजी को राज्य का अधिकारी बनाया और उन्हें अपना वस्त्र दिया जो शिवाजी के राज्य का भगवा ध्वज बना। शिवाजी की प्रेरणा मानकर डा.हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। संघ का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का रहा है जो आज भी उस पर अडिग है। राजनीतिक तुष्टिकरण से, संतुष्टिकरण से, धार्मिकता ही नहीं मानवता भी कराह उठी है। भगवा से हिन्दू भावनाएं जुड़ी हैं। उनके संत पूज्यनीय हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कह कर उसे रंग देना क्या उचित है। राष्ट्रीय अस्मिता को बरकरार रखने वाले भगवाधारी देश ही नहीं विदेशों में भी मानवता का सन्देश दे रहे हैं। ऐसे में भगवा आतंकवाद कहाँ पनप उठा।
भारत की एकता अखण्डता के सूत्र भगवा रंग -वस्त्र में अवगुन्थित राजनीति,सत्ता पर बरक़रार रहने के लिए देश की अस्मिता को ठेस पहुंचाना है, सामाजिकता नहीं है। आमजन की उदार सहिष्णुता कट्टरपंथ के मार्ग पर चल पड़े तो क्या होगा?
(मेरे अखबार " क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ " के २०/०९ /१० के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय )
शनिवार, 28 अगस्त 2010
कुछ तो शर्म करो...
ब्लागर जगत के मित्रों की शिकायत हो सकती है कि कई दिनों से अपने ब्लॉग में कुछ लिख क्यों नहीं रहा हूँ. कुछ व्यक्तिगत कारणों से व्यस्तता के चलते लिख नहीं पाया इसलिए मेरे बुद्धिजीवी मित्रों का मै क्षमाप्रार्थी हूँ. परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे मन के गुबार मिट गए हैं. इस बीच विश्व के सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश में जो शर्मनाक घटना घटी और उसकी कोई आक्रोशित प्रतिक्रिया भारत की जनता ने प्रगट नहीं की उससे मन व्यथित हो गया और अपनी व्यथा आप लोगों के समक्ष व्यक्त क़र रहा हूँ इस उम्मीद के साथ शायद कोई जयप्रकाश, दीनदयाल,लोहिया के इस देश की चिंता करेगा और सोचेगा अपने स्वार्थ से राष्ट्र हित बड़ा होता है हम मिटते हैं तो राष्ट्र खड़ा होता है:-
देश का अनाज भले ही सड़ जाये मगर उसे गरीब जनता में नहीं बांटा जा सकता. देश की सरकार का यह मानना है. भारत के 30 करोड़ लोग गरीबी,भूख,कुपोषण से बेहाल हैं.इस फटेहाल देश के 787 सांसदों ने अपनी तकदीर खुद लिख ली. सांसदों ने एक झटके में अपना वेतन तीन गुना बढ़ा लिया. यह कोई मजदूर नहीं हैं जिन्हें अपनी मजदूरी बढ़ाने के लिए जुलुस निकालना पड़ता है या कोई आन्दोलन करके लाठी और गोली खाना पड़ता है. ये हमारे देश के चुनिन्दा जन प्रतिनिधि हैं जिन्हें सौ करोड़ से अधिक लोगों ने सरकार बनाने के लिए चुना है.
16 हजार रूपये पाने वाले सांसदों का वेतन 50 हजार रुपया हो गया इस पर हमारे माननीय सांसदों को संतोष नहीं हुआ.संसद भवन में एक नई नौटंकी हुई.संसद को भंग क़र एक नई सरकार बना डाली जिसके संयुक्त प्रधानमंत्री लालूप्रसाद यादव और मुलायमसिंह बने. लोकसभा अध्यक्ष भाजपा के गोपीनाथ मुंडे को बनाया गया. यह नाटक नौटंकी महज इसलिए कि,तिगुनी वेतन वृद्धि भी हमारे सांसदों का पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं है. आखिरकार सांसदों की अनेक सुख सुविधाओं और भत्ते में बढोतरी की गई.
भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी ने सांसदों के ऐसे रवैये पर विरोध जाहिर किया, मगर सांसदों के नक्कार खाने में आडवाणी की तूती फीकी पड़ गयी. हमारे जन प्रतिनिधि ही ऐसे हैं जो अपनी तनख्वाह,भत्ता,सुविधा खुद तय क़र लेते हैं आखिर वे सरकार जो ठहरे. ऐसा करते वे तनिक भी शर्मिंदा नहीं होते बल्कि देश की जनता का सिर शर्म से झुक जाता है जिन्होंने खुद उनको चुन क़र भेजा है.
सांसदों ने जनता के लिए नहीं बल्कि अपनी खिचड़ी खुद पकाई और भरपूर घी भी डाल लिया.50 हजार रुपया महीना वेतन के अलावा सांसद कार्यालय की खर्च सीमा 20 हजार रूपए से दूना क़र 40 हजार हो गयी.निर्वाचन क्षेत्र के भत्ते को 20 हजार से बढाकर 40 हजार रूपये क़र दिया.निजी वाहन खरीदने के लिए 1 लाख रूपये ब्याज मुक्त ऋण बढकर 4 लाख हो गया. सांसदों द्वारा उपयोग में आने वाले वाहनों की रोड माइलेज 13 रूपये से बढकर 16 रूपये प्रति किलोमीटर क़र दी गई. पेंशन लाभ 8 हजार रूपये से बढकर 20 हजार हो गई.साल भर में सांसद को 1 लाख 50 हजार मुफ्त फोन काल की सुविधा के साथ तीन लैंड लाइन और 2 मोबाईल मुफ्त मिलेंगे. मुफ्त आवास की सुविधा के साथ सरकार 60 हजार का फर्नीचर भी देगी. साल भर में 50 हजार यूनिट बिजली भी मुफ्त.
लोकसभा, राज्यसभा के सांसदों के केवल वेतन पर साल भर में 13 करोड़ 76 लाख खर्च होते हैं और अब 62 करोड़ 50 लाख 75 हजार 796 रूपये का भार संसदीय बजट पर पड़ेगा. सचिवों से एक रुपया अधिक वेतन की मांग करने वाले सांसदों को यह गुमान नहीं है कि वे जनता के चुने हुए जन प्रतिनिधि हैं. वेतन भोगी कर्मचारी नहीं. जनता ने उन्हें जन सेवा के लिए भेजा और उन्होंने जन सेवा के नाम पर घर घर जाकर वोट माँगा है.
देश की लोकसभा और राज्यसभा में 787 सांसदों पर 172 करोड़ रुपया का खर्च आता है जहाँ हमारे सांसद उंघते हैं, कोई चिल्लाता है,कोई लड़ता है मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी एक मत नहीं होते. मगर अपने स्वार्थ के लिए सभी एक स्वर में चिल्ला रहे थे और फिर भी संतुष्ट नहीं हुए. ऐसे में भला देश की गरिमा,अस्मिता की बागडोर थामने वाले हमारे सांसद किसका भला करेंगे. ऐसे में कवि धूमिल की पंक्तियाँ याद आती हैं जिन्होंने लिखा है-
एक आदमी रोटी बेलता है
दूसरा आदमी रोटी सेंकता है
तीसरा आदमी रोटी से खेलता है
यह तीसरा आदमी कौन
मेरे देश की संसद मौन
शनिवार, 31 जुलाई 2010
फैसला स्वागत योग्य
छत्तीसगढ़ में बढती औद्योगिकी गतिविधियों से आम जन जीवन त्रस्त हो उठा है। विपुल संसाधन, एवं सस्ते श्रम ने औद्योगिक परिवेश को गति तो दी मगर संस्टेबल डेवलपमेंट (टिकाऊ विकास) की ओर कोई ध्यान नहीं दियागया। रायगढ़ से राजधानी रायपुर सहित बस्तर जैसे सुदूर क्षेत्र में औद्योगिक प्रदूषण की मार से कई समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। रायपुर का नाम देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहर की सूची में आ चुका। बस्तर की डंकनी -शंखनी नदी देश की सबसे अधिक प्रदूषित नदी बन चुकी है। राज्य की सभी नदियों का कमोवेश यही हश्र हो रहा है। ताप आधारित पावर प्लांट की बाढ़ से भले ही उर्जा के मामले में राज्य आत्म निर्भर दिख रहा है मगर फ्लाई एश के सुरक्षित निपटाने के लिए ठोस कदम व्यवहारिक नहीं हो सके हैं। राज्य में उद्योगों के असंतुलित विकास से अनेक बुनियादी सुविधाएँ आम आदमी से छिनती नज़र आ रहीं हैं। जिसमें नदी सहित भू जल स्तर गिरा है तो कहीं वायु प्रदूषण से बीमारियाँ फैलने का खतरा मंडरा रहा है , विषाक्त औद्योगिक जल खुले आम जल श्रोतों में बहाया जा रहा है। राजधानी रायपुर में जब तब बरसती कालिख से जन जीवन व्यथित हो उठा है। औद्योगिक प्रदूषण फैलने वाले उद्योग आखिर क्यों पर्यावरण के खिलाफ काम करने में डरते नहीं हैं। यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।
मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ में अब और उद्योग नहीं लगाये जायेंगे। यह स्वागत योग्य फैसला है।
विधान सभा में स्थानीय शासन ,परिवहन व पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत की पहल पर अशासकीय संकल्प पारित हुआ यह प्रदूषण के खिलाफ अच्छी शुरुवात है। ठोस अपशिष्ट फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ कठोर कदम उठाने के लिए सरकार कृत संकल्प दिख पड़ रही है, वहीँ इससे सम्बन्धित कुटीर उद्योगों को मूर्त रूप देने की कार्ययोजना बेहतर पहल है। औद्योगिक विकास इस गति से न हो कि वह भस्मासुर साबित होने लगे। छत्तीसगढ़ में उद्योगों का समन्वित विकास हो वहीँ लघु व कुटीर उद्योगों को बढावा देकर एक अच्छी शुरुवात हो सकती है।
नारायण भूषणिया
शनिवार, 24 जुलाई 2010
क्या शहीद चंद्रशेखर आज़ाद को हम भुला देंगे ?
कल २३ जुलाई को मन में यह भाव उठा कि,आज उस महान शहीद की कोई प्रतिमा इस छत्तीसगढ़ की राजधानी में ढूँढें और उस पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाये तथा अपने अखब़ार 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़ 'में यह जानकारी छापी जाए । राज़धानी में एक चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड है तथा एक आज़ाद चौक भी है यह हमें मालूम था। मैं 'क्रांतिरथ छत्तीसगढ़' में अपनी सहयोगी अर्चना हुखरे के साथ शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की मूर्ति की तलाश में निकल पड़ा। मठ पुरेना क्षेत्र जो वर्तमान में चंद्रशेखर आज़ाद वार्ड के नाम से जाना जाता है। स्वाभाविक रूप से वहां शहीद आज़ाद की मूर्ति होगी,यह विचार मन में आया,हम वहां गए और पता भी लगाया पर वहां कोई भी मूर्ति नहीं मिली।
फिर हम आज़ाद चौक गए तो सबसे बड़ा आश्चर्य ये हुआ कि,आज़ाद चौक के नाम से जो चौक है,वहां प्रतिमा गाँधी जी की लगी हुई है। कुछ पुराने जानकारों से एवं अन्य विश्वस्त सूत्रों से जानकारी मिली कि,गाँधी जी की मूर्ति वाले इस चौक का आज़ाद चौक नाम १४ वर्षीय बलीराम आजाद की स्मृति में रखा गया था। बलीराम आजाद ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वानर सेना बनाई थी।बलीराम जी के बारे में और कोई ज्यादा जानकारी तत्क्षण नहीं मिल पाई और यह हमारा कल का विषय भी नहीं था।
आज़ाद चौक पर लगी गाँधी जी की मूर्ति को बनवाने का श्रेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कमलनारायण शर्मा को जाता है। उन दिनों पंडित रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री थे। प्रशासन मुख्यमंत्री शुक्ल से उद्धघाटन कराना चाहता था किन्तु कमलनारायण शर्मा इसके लिए तैयार नहीं हुए।
उन दिनों राष्ट्रपति डा.राजेन्द्रप्रसाद रायपुर आने वाले थे।श्री शर्मा डा.राजेन्द्रप्रसाद के कर कमलों से मूर्ति का उद्धघाटन कराना चाहते थे। मुख्यमंत्री शुक्ल प्रतिमा को देखने आये। सरकार और राष्ट्रपति को खबर दी गई कि,मूर्ति गाँधी जी जैसी नहीं दिखती है। इससे विवाद निर्मित हो गया।
१४ सितम्बर १९५६ को महामहिम राष्ट्रपति जी आने वाले थे,इसके पूर्व १३ सितम्बर की शाम को कमलनारायण शर्मा और रामसहाय तिवारी ने एक हरिजन की बेटी से प्रतिमा का
उद्धघाटन करा दिया। बाद में इस हरिजन बेटी ने महामहिम को माला भी पहनाई थी।
ये तो हुई गाँधी प्रतिमा वाले आज़ाद चौक की कहानी।
हमें बहुत दुःख और गुस्सा भी आया कि,रायपुर में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की एक भी प्रतिमा नहीं लगी है।
हमने चंद्रशेखर आज़ाद के चित्र पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
मेरी उन साथियों से आग्रह है जो ये मानते हैं कि,भारत को आज़ादी दिलाने में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का भी अतुलनीय योगदान है,तो अपने अपने स्तर पर उन्हें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहीद आज़ाद की स्मृति में बनाये गए वार्ड में उनकी भव्य प्रतिमा लगवाकर उनकी आने वाली पुण्य तिथि २७ फ़रवरी को उद्धघाटन करवाने का प्रयास करना चाहिए।
नारायण भूषणिया
सोमवार, 19 जुलाई 2010
जगदीश उपासने को पितृ शोक
बाबूजी तो शारीरिक रूप में आपातकाल के दौरान ही कमजोर होने लगे थे पर लोकतंत्र पर हुए प्रहार के विरोध में अपने बेटों के द्वारा किये गए सत्याग्रह से उनका सीना गर्व से फूला रहता था और फिर ममतामयी मां रजनी ताई का भी तो ध्यान रखना था,आखिर उस माँ पर क्या गुजरती होगी जिसके बेटे बिना किसी अपराध के जेल में हो . इस प्रकार की मानसिक पीड़ा को झेलते बाबूजी का स्वास्थ्य कमजोर होता रहा और वे जिन्दगी की हर जंग को लड़ते लड़ते आज मौत से हार गए .
आज शाम ५ बजे रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में उनका नश्वर शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया . उनके अंतिम समय में अस्पताल में मुख्यमंत्री डा.रमनसिंह उपस्थित थे तथा अंतिम संस्कार के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ट शांताराम जी ,दिनकर भाकरे ,मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ,खनिज निगम के अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल,गृह निर्माण मंडल केअध्यक्ष सुभाष राव ,सांसदरमेश बैस,भाजपा,आर .एस .एस.,विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं
सहित शहर के सभी वरिष्ट पत्रकार गणों ने उपस्थित होकर स्वर्गीय दत्तात्रेय उपासने को श्रद्धांजली अर्पित की.
मेरी ईश्वर से यह प्रार्थना है कि,अतिपूज्य ताई तथा सम्पूर्ण उपासने परिवार को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें .ॐ शांतिः शांतिः शांतिः -नारायण भूषणिया